कहां तेरी मंज़िल कहां है ठिकाना
मुसाफ़िर बता दे कहां तुझको जाना
कहां तेरी मंज़िल ...
गगन में उड़ने वालों का भी गुलशन रैन-बसेरा है
घर की ओर चले राही तो धुंधली शाम सवेरा है
सूरज-चांद-सितारे हैं तो उनकी भी मंज़िल है
मंज़िल है तो जहां भी जाए राह तेरी झिलमिल है
बिन मंज़िल बेकार है ग़ाफ़िल, क़दम भी उठाना
मुसाफ़िर बता दे...
(1959) फ़िल्म 'नई राहें'