विज्ञापन

हिंदी कविता: धूमिल की कविता बम फटने का दुख तो होता है पर उतना ज़्यादा नहीं

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            बम फटने का
        
                                                    
                            
दुख तो होता है पर
उतना ज़्यादा नहीं, चाय के
ठंडे होने का दुख जितना

कहीं देखकर बलात्कार की कोई घटना
उतनी देर तड़पती रहतीं नहीं धमनियाँ
जितनी उस क्षण—
जब दो परिचित-सी आकृतियाँ
नीची आँखें किए, परस्पर
बिना कहे कुछ
पास-पास से गुज़र गई हों।

दुःख होता है अगर किसी की
मिली नौकरी छूट गई हो
लेकिन उतना नहीं
कि जितना—
बार-बार सुनने पर भी फटकार
आदमी, लौट काम पर
फिर आया हो—
कॉलर फटी क़मीज़ पहनकर

वह दुःख सभी सहन कर
लेते हैं जो अर्थी के उठने पर
उग आता है,
लेकिन यह असह्य संवेदन
मन को तोड़-तोड़ जाता है—
यात्राओं की अंतिम गाड़ी
एक छोर पर रुकी हुई हो
पंगुल बच्चों की कतार जब
सड़क पार करने की आतुर मुद्राओं में
बैसाखी पर झुकी हुई हो। 
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।   
11 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

771 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10784 कविताएं

View Profile