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बिमल सहगल की तीन कविताएं

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  हवाई सेतु
महज़ काग़ज़ों पर ही 
बना लिए गए जो 
या फिर, बेशक, 
जिन्हें नसीब हुई जमीन,
ढह ही गए वे सभी सेतु
समय बीतते, 
और बहुधा, समय से कहीं पहले। 
इन अभियांत्रिकी प्रतिरूपों को
बनाते-बनाते, मग़र, 
बाँध लिए गए जो हवाई सेतु
या फिर जो
किन्हीं निहित स्वार्थ में, 
खुद-ब-खुद बन कर निकले     
आसान सी पगडंडियाँ-
इस जेब से उस जेब तक, 
वे सब व्यावहारिक संपदा के 
अटूट स्तम्भ बने, 
मजबूती से खड़े रहे-
सालों-साल चलते, क्योंकि, 
महज ईंट और गारे से नहीं-
बनाये गए थे वे सभी, 
सोने-चांदी की ईंटों से!
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इतिहास की भूलभुलैया-गलियां 

अक्सर देखा है
जब कभी मिल जाते हैं कहीं 
कुछ उम्रदराज लोग 
पुरानी जान-पहचान वाले,
कुशल-मंगल जानने की 
औपचारिकता के पश्चात 
निश्चित रहता है, उनका
पुराने साथियों को भी 
यादों में वहीं बुला लाना, 
बीते वक्त में लौटना, 
बिछड़े अतीत से 
गर्मजोशी से जा मिलना;
यूं अपने साझे इतिहास के 
उन खुश-लम्हों को 
फिर से जी लेना। 

उनके, खबरें सुनते-सुनाते 
एक-दूजे को बारी-बारी,:
जिक्र चला आता है, जैसे ही 
दिलदार दोस्तों का, मगर-
भला कौन-कौन चला गया,
और कौन करे बैठा तैयारी
तो ग़म भी आ धमकता है 
किसी लेनदार सा 
वसूलने अपना बकाया 
या फिर ज्यों बिचौलिया, 
अपना हिस्सा हथियाने। 

और फिर जब कभी बाद में
याद किए गए वो खुद भी
किन्हीं दूसरों के मिलने पर,
जिक्र अपना भी सुना उन्होंने,
उन लोगों की ही शुमारी में, 
जो कर गए थे चलाना। 

यूं लगा रहा मिलना-जुलना
पुराने उम्रदराज दोस्तों का -
भूली यादों को दोहराना,
मेहमाननवाज़ अतीत के घर
बेझिझक चले जाना,
और उस महरूम मेहरबान को 
जाकर थमा आना,
रूठे वर्तमान के खिलाफ    
अपना कोई नया उलाहना।
ऐसे ही तो चलता आया है,
सदियों से,
गुम होती जाती पीढ़ियों का
इतिहास की भूलभुलैया-
गलियों में से 
कतार बना गुजरना, और 
भूतकाल में जा सिमट,
सभी का खो जाना।

फलियाँ एक डाल की

एक ही डाल की फलियाँ 
पक कर, बीज बन 
विसर्जन प्रक्रिया में छितरा जाती हैं जैसे 
दूर-दूर
विभिन्न दिशाओं में; 
बहुधा, परिस्थितियों-वश 
बेमेल मिट्टी, जलवायु और वातावरण से समझौता करते, 
प्रकृति के नियम की उसी विडंबना-वश 
एक ही माँ की बेटियाँ परिपक्व हो, ब्याह कर 
परंपरागत प्रत्यारोपण की विविधता में रचती
बिखर जाती हैं नियति निभाते 
नए मूल्यों, धारणाओं को अपनाते
और अनदेखी, असमतल 
आर्थिक, सामाजिक सरंचनाओं में जा रमते 
वहीं की बन जीने- मातृ धर्म निभाते, 
पुरखों की विरासत को आगे बढ़ाते। 

2 महीने पहले
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