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हे प्राणों के प्रिय सपने: भुवनेश्वर 

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  तुम दूर देश की वासी। 

हे प्राणों के प्रिय सपने 
निखरे सपनों की काया 
मेरे इस लघु जीवन में 
ऐ असीम स्वर्ग की छाया 
मैं बाट जोहती पुरवासी—तुम दूर... 
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मेरे जीवन में आओ 
मेरे जीवन के वन को 
मृदु आलोकित कर जाओ 
चंदा तारा से आओ 
मैं संध्यागत आभा-सी-तुम दूर... 

यह कौन गीत-सा गाकर 
बहलाता है मेरा मन 
किसकी मुस्कानें उर में 
खिलती फूलों-सी धर-तन 
मैं एक अज़ान आशा-सी-तुम दूर... 
5 वर्ष पहले
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