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भगवत रावत की कविता- हे बाबा तुलसीदास

काव्य डेस्क

Kavita
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                            चोर की चोरी
        
                                                    
                            
साहूकारी साहूकार की
दासता दास की
और अफसर का अफसरी

बेईमानी बेईमान की
दरिद्रता स्वाभिमानी की
ग़रीब की ग़रीबी
और तस्कर की तस्करी

दिन दूनी रात चौगुनी
फल फूल रही
कमाई कुकरम की
और अजगर की अजगरी

मज़े में हैं यहाँ सब
हे बाबा तुलसीदास
कविताई ससुरी अब
कहाँ जाय का करी।

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