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Hindi Kavita: विनोद कुमार शुक्ल की कविता 'ईश्वर अब अधिक है सर्वत्र अधिक है'

काव्य डेस्क

Kavita
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ईश्वर अब अधिक है
सर्वत्र अधिक है
निराकार साकार अधिक
हरेक आदमी के पास बहुत अधिक है।
बहुत बँटने के बाद
बचा हुआ बहुत है।
अलग-अलग लोगों के पास
अलग-अलग अधिक बाक़ी है।
इस अधिकता में
मैं अपने ख़ाली झोले को
और ख़ाली करने के लिए
भय से झटकारता हूँ
जैसे कुछ निराकार झर जाता है।

2 वर्ष पहले
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