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Hindi Kavita: हेमंत देवलेकर की कविता 'पेड़ों का अंतर्मन'

काव्य डेस्क

Kavita
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कल मानसून की पहली बरसात हुई


और आज यह दरवाज़ा ख़ुशी से फूल गया है


खिड़की दरवाज़े महज़ लकड़ी नहीं हैं
विस्थापित जंगल होते हैं

मुझे लगा, मैं पेड़ों के बीच से आता-जाता हूँ,
टहनियों पर बैठता हूँ
पेड़ों की खोखल में रखता हूँ किताबें

मैं, जंगल में घिरा हूँ
किंवदंतियों में रहने वाला
आदिम ख़ुशबू से भरा जंगल

कल मौसम की पहली बारिश हुई
और आज यह दरवाज़ा
चौखट में फँसने लगा है
वह बंद होना नहीं चाहता
ठीक दरख़्तों की तरह

एक कटे हुए जिस्म में
पेड़ का ख़ून फिर दौड़ने लगा है
और यह दरवाज़ा बचपन की स्मृतियों में खो गया है

याद आने लगा है
किस तरह वह बाँहें फैलाकर
हज़ारों हथेलियों में समेटा करता था
बारिश को
और झूमने लगता था
वह स्मृतियों में फिर हरा हुआ है।

2 वर्ष पहले
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