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बंसल बेबाक की 3 चुनिंदा कविताएं

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  आत्मा की निरन्तरता - नश्वर शरीर

साँसें हो रही हैं कम,
नयन भी हो गये हैं नम,
जिन्दगी रह गयी है चन्द,
फिर किस बात का है घमण्ड,
साँसें हो रही......

फिर क्यों है हेरा फेरी,
तीन-पाँच, तेरा-मेरी,
क्यों करते हो प्रपंच,
अभी भी मन में है द्वन्द,
साँसें हो रही.....

यह कैसा अनर्गल विचार,
परिजनों को भी है आराम,
धन, मान, सम्मान है,
फिर भी क्यों हो परेशान।
साँसें हो रही.....

दम निकल रहा है,
ये प्रभु की नियामत है,
अभी भी कुछ वक्त है बाकी,
सुकर्म कर परहित, जनहित में,
कल्याण होगा तेरा,
फिर मिले या न मिले,
ये जीवन दोबारा।
साँसें हो रही.....
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उनकी यादें

कहाँ चले गये तुम,
बिना बताये ही,
इस जहाँ में मुझे,
तन्हा ही छोड़ गये,
किया बहुत यत्न,
तुझे ढूढ़ पाने का,
प्रयास हो गये व्यर्थ।
बिना बताये.........

तुझे भुलाने के लिए,
कोई तो शग़ल चाहिए,
और कुछ नहीं तो,
कुछ स्वप्न ही चाहिए,
कभी स्वप्न में ही,
आया जाया करो,
दिल को सकून हो जाये।
बिना बताये.........

कुछ तो वक्त देते हमें,
समझने और सुधरने का,
कुन्दन को भी चमकने के लिए,
कुछ वक्त और तपन चाहिए।
बिना बताये.......

हर उपक्रम विधा की,
तुझे भुलाने की,
मगर बढ़ती गयी,
हृदय की अग्न,
बन गयी दावानल,
अग्न के शमन के लिए,
लगता है लेने पड़ेंगे,
न जाने कितने जनम।
बिना बताये.........

लहरों को क्या नहीं है खबर

लहरों को क्या नहीं है खबर,
कर ले वह चाहे जो भी प्रयत्न,
होगा न उन पर कोई असर,
इतने हैं मगरूर बेशरम,
नदी में वो बिखरे पत्थर,
लहरों को क्या......

लेकिन लहरों ने ठान ली,
कि मारेंगे सिर,
पत्थरों पर मुस्तकिल,
देखना एक दिन,
पत्थर टूट जायेंगे,
बजरी बन,
रेत-रेत हो जायेंगे,
और लहरों का प्रयास,
हो जायेगा सफल।
लहरों को क्या......
2 वर्ष पहले
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