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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता- दुनिया का इतिहास पूछता

काव्य डेस्क

Kavita
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                            दुनिया का इतिहास पूछता,
        
                                                    
                            
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता।
वह उन्नत ईरान कहाँ है?

दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा।

शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा।
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा।

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5 महीने पहले
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