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अशोक वाजपेयी: यह ठहरा हुआ निर्जन समय, जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  यह ठहरा हुआ निर्जन समय 
जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं, 
जिसमें रोज़मर्रा की आवाज़ें नहीं सिर्फ़ गूँजें भर हैं, 
जिसमें प्रार्थना, पुकार और विलाप सब मौन में बिला गए हैं, 
जिसमें संग-साथ कहीं दुबका हुआ है, 
जिसमें हर कुछ पर चुप्पी समय की तरह पसर गई है, 
ऐसे समय को हम कैसे लिख पाएँगे? 
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पता नहीं यह हमारा समय है 
यहाँ हम किसी और समय में बलात् आ गए हैं 
इतना सपाट है यह समय 
कि इसमें कोई सलवटें, परतें, दरारें, नज़र नहीं आतीं 
और इससे भागने की कोई पगडंडी तक नहीं सूझती। 

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे। 

यह समय धीरे चल रहा है 
लगता सब घड़ियों ने विलम्बित होना ठान लिया है; 
बेमौसम हवा ठंडी है; 
यों वसंत है और फूल खिलखिला रहे हैं 
मानो हमारे कुसमय पर हँस रहे हों 
और गिलहरियाँ तेज़ी से भागते हुए 
मुँह चिढ़ाती पेड़ों या खंभों पर चढ़ रही है; 
अचानक कबूतर कुछ कम हो गए हैं जैसे 
दिहाड़ी मज़दूरों की तरह अपने घर-गाँव वापस 
जाने की दुखद यात्रा पर निकल गए हों : 
हमें इतना दिलासा भर है कि 
अपने समय में भले न हों, हम अपने घर में हैं। 

उम्मीद किसी कचरे के छूट गए हिस्से की तरह 
किसी कोने में दुबकी पड़ी है 
जो आज नहीं तो कल बुहारकर फेंक दी जाएगी। 

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे। 
5 वर्ष पहले
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