बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है
उस की कलियां हैं मेरी आंखें,
कोंपलें मेरी अंगुलियों में अंकुराती हैं;
फूल-अरे, यह दिल में क्या खिलता है।
सांस उस की पंखुड़ियां सहलाती हैं,
बांहें उसी के वलय में बंध कसमसाती हैं।
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है,
जितना मैं चुकता जाता हूं,
वह मुझे ऐश्वर्य से मढ़ती है।