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Hindi Kavita: अज्ञेय की कविता 'बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है'

काव्य डेस्क

Kavita
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बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है
उस की कलियां हैं मेरी आंखें,
कोंपलें मेरी अंगुलियों में अंकुराती हैं;
फूल-अरे, यह दिल में क्या खिलता है।

सांस उस की पंखुड़ियां सहलाती हैं,
बांहें उसी के वलय में बंध कसमसाती हैं।
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है,
जितना मैं चुकता जाता हूं,
वह मुझे ऐश्वर्य से मढ़ती है। 

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