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तस्वीरें, जो ग़ज़लों में बोलती हैं...

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  झूम के जब रिंदों ने पिला दी 
शैख़ ने चुपके चुपके दुआ दी 

एक कमी थी ताज-महल में 
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी 

आप ने झूटा वा'दा कर के 
आज हमारी उम्र बढ़ा दी 

हाए ये उन का तर्ज़-ए-मोहब्बत 
आँख से बस इक बूँद गिरा दी 

-कैफ़ भोपाली

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इक मोहब्बत की ये तस्वीर है दो रंगों में: जावेद अख़्तर

सारी हैरत है मिरी सारी अदा उस की है 
बे-गुनाही है मिरी और सज़ा उस की है 

मेरे अल्फ़ाज़ में जो रंग है वो उस का है 
मेरे एहसास में जो है वो फ़ज़ा उस की है 

शेर मेरे हैं मगर इन में मोहब्बत उस की 
फूल मेरे हैं मगर बाद-ए-सबा उस की है 

इक मोहब्बत की ये तस्वीर है दो रंगों में 
शौक़ सब मेरा है और सारी हया उस की है 

हम ने क्या उस से मोहब्बत की इजाज़त ली थी 
दिल-शिकन ही सही पर बात बजा उस की है 

एक मेरे ही सिवा सब को पुकारे है कोई 
मैं ने पहले ही कहा था ये सदा उस की है 

ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के 
वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है 

उस ने ही इस को उजाड़ा है इसे लूटा है 
ये ज़मीं उस की अगर है भी तो क्या उस की है 

देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी: अहमद फ़राज़

जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी 
देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी 

तन्हाई में रोते हैं कि यूँ दिल को सुकूँ हो 
ये चोट किसी साहब-ए-महफ़िल से लगी थी 

ऐ दिल तेरे आशोब ने फिर हश्र जगाया 
बेदर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी 

ख़िल्क़त का अजब हाल था उस कू-ए-सितम में 
साए की तरह दामन-ए-क़ातिल से लगी थी 

उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया 
जब कश्ती-ए-जाँ मौत के साहिल से लगी थी 
8 वर्ष पहले
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