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विष्णु खरे: ये दुहराए गए शब्द फ़क़त उसका खुलासा हैं

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  कभी-कभी
जब उसे मालूम नहीं रहता कि
कोई उसे सुन रहा है
तो वह हौले से उसाँस में सिर्फ़
हे भगवन हे भगवन कहती है
वह नास्तिक नहीं लेकिन
तब वह ईश्वर को नहीं पुकार रही होती
उसके उस कहने में कोई शिक़वा नहीं होता
ज़िन्दगी भर उसके साथ जो हुआ
उसने जो सहा
ये दुहराए गए शब्द फ़क़त उसका खुलासा है
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खाओ खाओ कोई बात नहीं

एक अनाम दिशा में तकते जाने क्या सोचते अपना पेट भरते हैं
कभी-कभी एक आदिम लम्हे के लिए अचानक अचानक अपने आस-पास देख लेते हुए
मैं इतना चाहता हूं कि वे मुझे अपने पास इतनी दूर पर इस तरह बैठने दें
जहां से वे मेरे चेहरे पर देख सकें कि मैं अपने मन में उनसे कह रहा हूं
खाओ खाओ कोई बात नहीं

लेकिन मुझे मालूम है...

लेकिन मुझे मालूम है कि ऐसी किसी भी हरकत से
शांति से खाने की उनकी एकांत लय में विघ्न पड़ेगा
और वे आधे पेट ही उठ जाएंगे
इसलिए मैं खुद को इसी इसी भरम से बहलाकर चला आता हूं
कि जहां ऐसी अकेली औरतें ऐसे अकेले बच्चे अपनी उस जून की कठिन रोटी खा रहे होते हैं
वहां एक वाजिब दूरी पर जो कुत्ते बैठे हुए हैं किसी खुश उम्मीद में बेहद
हौले अपनी पूंछ हिलाते हुए
उसमें भी शामिल हूं अपनी वह बात कुछ उसी तरह कह सकने के लिए
8 वर्ष पहले
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