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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें...

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            -निदा फ़ाज़ली- 
        
                                                    
                            

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाये

क्या हुआ शहर को कुछ भी तो नज़र आये कहीं
यूं किया जाये कभी खुद को रुलाया जाये

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये

खुदकुशी करने कि हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये

(साभार- कविता कोश)
9 वर्ष पहले
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