-नज़ीर अकबराबादी-
दूर से आये थे साक़ी सुनके मयख़ाने को हम
बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम
मय भी है मीना[1] भी है साग़र भी है साक़ी नहीं
दिल में आता है लगा दें आग मयख़ाने को हम
क्यूं नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर
क्या तेरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम
हमको फंसना था क़फ़स[3] में क्या गिला सय्याद[4] का
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम
ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई
अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम
शहर में लगता नहीं सहरा[6] से घबराता है दिल
अब कहां ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम
क्या हुई तक़्सीर[7] हम से तू बता दे ऐ 'नज़ीर'
ताकि शादी-मर्ग[8] समझें ऐसे मर जाने को हम
1.शीशे की सुराही 2.शराब का प्याला 3.पिंजरा 4.शिकारी 5.पानी 6.रेगिस्तान, बयाबान 7.ग़लती 8.खुशी से मौत