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यादें-जब इस संगीतकार ने रफ़ी की शख़्सियत को बयां करने के लिए उठाई कलम....

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  रफ़ी साहब और संगीतकार नौशाद के संबंध बहुत अच्छे थे। नौशाद साहब ने मोहम्मद रफ़ी के प्रति अपने लगाव को कुछ शेरों और नज़्मों के माध्यम से व्यक्त किया। 

अल्लाह-अल्लाह रफ़ी की आवाज़
रूहे-महमूदो-जान-ए-बज़्मे-अयाज
उसकी हर तान, उसकी हर लय पर
बजने लगते थे ख़ुद दिलों के साज़।।

गायकी है हुस्न-ए-फ़न तेरा रफ़ी
तेरे फ़न पे हम सभी को नाज़ है 
तेरे शाहकोरों ने समझाया हमें 
ज़िदगानी प्यार का इक साज़ है 
मेरी सरगम में भी तेरा जिक्र है 
मेरे गीतों में भी तेरी आवाज है 
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गूंजते हैं तेरे नग़मों से अमीरी के महल 

गूंजते हैं तेरे नग़मों से अमीरी के महल 
झोपड़ी में भी ग़रीबों के तेरी आवाज है 

अपनी मौसीक़ी पे सबको फ़ख़्र होता है मगर 
मेरे साथी आज मौसीक़ी को तुझ पर नाज़ है 

शख़्सियत दिल नवाज़ रखता था 
क्या गले में गुदाज़ रखता था 
अपने हों या पराये सब के लिए 
दिल का दरवाज़ा बाज रखता था 

कभी इस पार और कभी उस पार

कभी इस पार और कभी उस पार
बहती नदिया था उसका हर आकार
याद करते हैं सब मिशालों में 
उसका वह चेहरा उसका वह किरदार

कभी बरछी कभी कटार था वह 
गीत संगीत की बहार था वह
इश्क़ और प्रेम उसका था पैगाम
दिल की दुनिया का राज़दार था वह 

मुस्कराती नज़र चुराये हुए 

मुस्कराती नज़र चुराये हुए 
चल दिया हक़ से लौ लगाये हुए 
हश्र तक लोग गाये जायेंगे 
जो तराने हैं उसके गाये हुए 

महफिलों के दामनों में साहिलों के आस-पास
यह सदा गूंजेगी सदियों तक दिल के आस-पास
मोहम्मद रफ़ी, मोहम्मद रफ़ी, मोहम्मद रफ़

साभार: पयंबर-ए-मौसीक़ी, मोहम्मद रफ़ी, चौधरी ज़िया इमाम,  (थाम्सन प्रेस) इंडिया
8 वर्ष पहले
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