भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्'आ
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बद्दुआ
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क्या वजह है प्यास ज़्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ
दोस्त, अपने मुल्क की क़िस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां