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मौजूदा वक्त में राह दिखाती कैलाश गौतम की कविता: ममता से, करुणा से

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  ममता से, करुणा से, नेह से दुलार से
घाव जहाँ भी देखो, सहलाओ प्यार से ।

नारों से भरो नहीं
भरो नहीं वादों से
अंतराल भरो सदा
गीतों-संवादों से
हो जाएँगे पठार शर्तिया कछार से ।
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भटके ना राहगीर 
कोई अँधियारे में
दीये की तरह जलो
घर के गलियारे में 
लड़ो आर-पार की लड़ाई अंधकार से ।

हाथ बनो, पैर बनो
राह बनो जंगल में
लहरों में नाव बनो
सेतु बनो दलदल में
प्यासों की प्यास हरो पानी की धार से ।

9 महीने पहले
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