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अतीत के सपनों में ले जाती जाबिर हुसेन की कविता...

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  बेख़्याली में 
उभर आयीं थीं 
काग़ज़
उनकी उंगलियों से 
कुछ 
बेमानी 
और सपाट
लकीरें 

खुली तो थीं 
मेरी आंखें 
लेकिन उनमें 
अलगाव का साया था 

पढ़ नहीं पायीं वो 
काग़ज़ की लकीरों के पीछे 
अपनी पारदर्शी कहानी 
थमे जब आंसू
और लौटे 
मेरी आंखों के सपने 
तो क़ाग़ज की लकीरों का 
अर्थ भी वापिस आया 
लकीरों ने मुझे 
दिलासा दिया 
और धीमे स्वर में बोलीं- 
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'गुज़र जायेंगी 
हां, गुज़र जायेंगी
ये बेचैन घड़ियां 
और 
अलगाव के अंदेशे भी 
सिमट जायेंगे 

ज़िंदगी कभी-कभी 
बस तुम्हें आज़माती है 
देखती है 
तुम कितने हो उसके 

बेख़्याली में 
मेरी उंगलियों से 
काग़ज़ पर
उभारी गयी लकीरें 
बोलती हैं इतना 
और सिमट जाती हैं 
एक रहस्यपूर्ण दायरे में 
अंदेशे अलगाव के फैल जाते हैं 
दोबारा 
मेरी आंखों पर 

और सपने 
आहिस्ता-आहिस्ता 
खंडहर में 
तब्दील होते हैं 
7 वर्ष पहले
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