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जन्माष्टमी विशेष - तुम ही तुम ही अधिनायक हो: नवीन सी. चतुर्वेदी

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  उँगली पै उठाय लिया गिरिराज, प्रबुद्ध, प्रवीण प्रशासक हो । 
तुम कालिय नाग के नाथनहार  - सचेतक, तत्व-विचारक हो । 
कुबजा और द्रौपदि लाज रखी - तुम सत्य समाज सुधारक हो । 
तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही अधिनायक हो ।। 
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प्रेम का पाठ पढ़ाया हमें और भक्ति का भाव सिखाते रहे हो । 
जीवन की महिमा हमको मुरली की धुनों में सुनाते रहे हो । 
सभ्य समाज बने इस हेतु स-कारण चीर चुराते रहे हो । 
गौ-कुल के हित साधन को खुद माखन चोर कहाते रहे हो ।। 
 

माखन से मख सिद्ध किया नवनीत का स्वाद चखाया हमें । 
कंस से लोहा लिया तुमने जनतंत्र का मन्त्र सुझाया हमें । 
वक़्त के साथ चले हर वक़्त यों वक़्त का मोल बताया हमें । 
प्रेम सिवाय विकल्प नहीं यह पाठ तुम्हीं ने पढ़ाया हमें ।।

सखियों के सखा गउओं के गुपाल गुवालों के मीत कहाते रहे । 
ललिता के मनोहर जाम्बुवती सँग भी तुम रास रचाते रहे । 
सब से सब की सब भाँति सुचारू सदैव 'नवीन' निभाते रहे । 
समता के लिए तुम जन्म लिया समभाव की ज्योति जगाते रहे ।। 
4 वर्ष पहले
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