सन 85 के जाड़ों का क़िस्सा है। मुंबई (तब की बंबई) में कांग्रेस का सौ साला अधिवेशन शुरू हुआ। मैं ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद पहली बार देश की इस कारोबारी राजधानी में पहुंचा हुआ था और जिन अजनबियों के सहारे मुझे इस शहर में छत मिली थी, उनके इसरार पर मैं कश्मीर से इस अधिवेशन में पहुंचे चंद कांग्रेसियों को बंबई घुमाने निकल पड़ा। इनमें से एक ने मुझसे बातचीत का सिलसिला शुरू करने की ग़रज़ से पूछा, मुलुक कौन सा है तुम्हारा?
मैं अचरज में कि भई मुल्क तो हम सबका एक ही है, भारत। फिर भला ये क्या सवाल हुआ तो हमारे ड्राइवर साथी ने समझाया कि मुलुक मतलब कि कहां के रहने वाले हो। पढ़ाई के दौरान और वैसे भी मैंने ये देखा था कि मेरे ज़िले के लोग अपनी पैदाइश के शहर का नाम बताने में कतराते थे। पर, मैंने साफ़ बोला, उन्नाव से हूं..., लोगों को शायद ये शब्द पहली बार सुनने को मिला था। उनकी पेशानियों पर उभरी सलवटें देख मैंने अपना वाक्य पूरा किया, .... जहां के हसरत मोहानी थे।
हसरत मोहानी का नाम सुनते ही गाड़ी में बैठे सारे कांग्रेसी उत्साहित हुए और फिर देर तक चंद्रशेखर आज़ाद, भगवती चरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और चंद्र भूषण त्रिवेदी उर्फ़ रमई काका पर गप्पसड़ाका चलता रहा। हसरत मोहानी थे तो कांग्रेसी ही, लेकिन पहले अंग्रेजों की पिटाई और फिर कांग्रेसियों की मुंहचलाई से वो परेशान रहे। कम लोगों को ही पता होगा कि पूर्ण स्वराज्य की मांग कांग्रेस में सबसे पहले हसरत मोहानी ने ही की और इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा भी मोहानी का ही दिया हुआ है।
लेकिन, बात आज यहां उनके दीवान की है। क़लम नवीसी के पेशे में आने के वक़्त से एक शेर जो हसरत मोहानी का आज तक मेरे साथ रहा, उसकी तपिश देखिए -
हज़ार खौफ़ हों पर ज़ुबां हो सच की रफ़ीक
यही रहा है अजल से कलंदरों का तरीक
वो कहते हैं ना कि आप जो शुरू के दिनों में पढ़ते हैं, वो ताउम्र पैरहन बनकर आपके जिस्म से चिपका रहता है। हसरत मोहानी की शायरी का असर भी मुझ पर कुछ ऐसा ही तारी रहा। अक्सर हम रोज़मर्रा के झगड़ों में बात आगे न बढ़ाने की सोच कर चुप रह जाते हैं। हसरत मोहानी लिखते हैं -
वो जब ये कहते हैं तुझ से ख़ता ज़रूर हुई
मैं बे-क़सूर भी कह दूं कि हां ज़रूर हुई
हसरत मोहानी ज़िद के बड़े पक्के थे। ऊपरवाले ने उनको एक बहुत ही संजीदा बीवी देकर ख़ास नेमत भी बख़्शी थी। मोहानी की पत्नी निशात उन निशां आम घरों की पहली मुस्लिम औरत थीं, जिसने बुर्क़ा पीछे छोड़कर आज़ादी की जंग में शिरकत की। जेल में हसरत की हिरासत के दौरान अपने शौहर के नक़्शे क़दम पर चलते हुए निशात बेगम ने उन्हें हौसला दिया और उनकी ग़ैर मौजूदगी में स्वदेशी सेंटर भी संभाला। हसरत ने सात सौ से ज़्यादा ग़ज़लें कहीं है और इनमें से आधी से ज़्यादा अंग्रेजी हुकूमत का क़ैदी बनकर हिंदुस्तान की अलग-अलग जेलों में लिखीं। मुल्क से मोहब्बत के अपने जज़्बे के लिए वो अपनी बेगम का काफी अहसान मानते थे, उन्होंने लिखा-
सियहकार थे बासफ़ा हो गए हम
तेरे इश्क़ में क्या से क्या हो गए हम
'हसरत मोहानी अपने ही देश में वो अब तक गुमनाम हैं'
हसरत मोहानी की शायरी पर आगे बढ़ने से पहले मुझे ग़ुस्सा इस बात का भी निकालना है कि आज़ादी के इस परवाने पर कभी कायदे से कहीं लिखा नहीं गया। कम्युनिस्ट पार्टी के देश में हुए पहले अधिवेशन का अध्यक्ष रहे इस शख़्स पर पाकिस्तान ने डाक टिकट निकाला, लेकिन अपने ही देश में वो अब तक गुमनाम हैं। कांग्रेस में हसरत मोहानी की गांधी से नहीं निभी।
मुस्लिम लीग में उनको जिन्ना की मज़हब के नाम पर मुल्क का बंटवारा करने की कोशिशें रास नहीं आईं। आज पूरा देश वीआईपी कल्चर को ख़त्म करने की बात करता है, कितनों को मालूम होगा कि सांसद को मिलने वाली सरकारी सहूलियतों के ख़िलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले हसरत मोहानी ही थे। गांधी की ही तरह हसरत भी बाल गंगाधर तिलक को अपना सियासी उस्ताद मानते थे। तिलक नहीं रहे तो हसरत ने लिखा -
मातम न हो क्यों भारत में बपा दुनिया से सिधारे आज तिलक
बलवन्त तिलक, महराज तिलक, आज़ादों के सरताज तिलक
जब तक वो रहे, दुनिया में रहा हम सब
के दिलों पर ज़ोर उनका
अब रहके बहिश्त में निज़्दे-ख़ुदा हूरों पे करेंगे राज तिलक
हर हिन्दू का मज़बूत है जी, गीता की ये बात है दिल पे लिखी
आख़िर में जो ख़ुद
भी कहा है यहीं फिर आएंगे महराज तिलक
हसरत मोहानी की शायरी में आशिक़ी की जो ख़लिश दिखती है वो उनको ग़ालिब, मीर और दूसरे शायरों से कम नहीं होने देती। नमूना देखिए -
तेरी महफ़िल से उठाता ग़ैर मुझको क्या मजाल
देखता था मैं कि तूने भी इशारा कर दिया
या फिर..
दो ही दिन में है न वो बात , न वो चाह, न प्यार
हम ने पहले ही ये तुम से न कहा था देखो
निकाह फ़िल्म की मशहूर ग़ज़ल निकली हसरत मोहानी की क़लम से...
हसरत मोहानी से जुड़े एक क़िस्से का ज़िक्र यहां करना बहुत ज़रूरी है। इससे इस बात का इल्हाम होता है कि कैसे इतना बड़ा शायर अपने पड़ोस के क़लम नवीसों के ध्यान से भी उतरा रहा। हुआ यूं कि कानपुर में जर्नलिज़्म के एक लेक्चर के दौरान मैं शागिर्द की मानिंद एक क्लास में बैठा था और लेक्चर चल रहा था 90 के शुरुआती दशक में अवध में हंगामा मचाए हिंदी के एक बड़े कवि का। कवि महोदय सूबे के बड़े अख़बार के पत्रकार भी थे।
बातों-बातों में हसरत मोहानी के बतौर क़लम नवीस स्ट्रगल का ज़िक्र निकला कि कैसे सब कुछ कुर्क हो जाने के बाद भी वे अलीगढ़ से अपना अख़बार निकालते रहे। कैसे स्वदेशी चीज़ों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने स्वदेशी सेंटर खोला और कैसे अपने एक जानकार के यहां सर्दियों की एक रात उन्होंने ठिठुर ठिठुर कर इसलिए काट दी क्योंकि जो कंबल उन्हें ओढ़ने को मिला, उस पर मेड इन इंग्लैंड लिखा था। मैंने बीआर चोपड़ा की फ़िल्म निकाह की मशहूर ग़ज़ल को हसरत मोहानी की क़लम से निकला हुआ बताया, तो लेक्चर दे रहे जनाब मुझ पर पिल पड़े। मुझे सरेआम खूब लानत भेजी गई कि मैं एक संजीदा क़िस्म के लेक्चर को हल्का बना रहा हूं। ख़ैर, सच तो सच ही होता है, उसे किसी सबूत की क्या ज़रूरत। क्या ख़ूब लिखा हसरत ने इस ग़ज़ल में -
चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
या फिर..
ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है
इसी सिलसिले में मुझे हसरत की वो ग़ज़ल भी याद आती है -
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना
शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुसवा करना
इक नज़र ही तेरी काफ़ी थी कि आई राहत-ए-जान
कुछ भी दुश्वार न था मुझ को
शकेबा करना
शेवा-ए-इश्क़ – प्रेम की परंपरा, शकेबा- सांत्वना देना
हसरत मोहानी के दीवान को अब भी ठीक से पढ़ा जाना बाक़ी है। बाक़ी ये भी है कि मादरे वतन की ख़ातिर अपना सब कुछ लुटा देने वाले इस फ्रीडम फाइटर की रचनाओं को नए सिरे से सहेजा जाए और अदब की दुनिया में उसे वो मुकाम दिया जाए, जिसका वो सही मायनों में हक़दार रहा। हसरत ने तो ख़ैर ना तब शिकायत की और न ही उनकी आदत ही रही कभी शिकायत करने की -
जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल-खेलो
पर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी।
9 वर्ष पहले