विज्ञापन

वो चुप-चाप आंसू बहाने की रातें, वो इक शख़्स के याद आने की रातें - फ़िराक़ गोरखपुरी

काव्य डेस्क

Irshaad
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            

वो चुप-चाप आंसू बहाने की रातें


वो इक शख़्स के याद आने की रातें

शब-ए-मह की वो ठंडी आंचें वो शबनम
तिरे हुस्न के रस्मसाने की रातें

जवानी की दोशीज़गी का तबस्सुम
गुल-ए-ज़ार के वो खिलाने की रातें

फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे
कुछ उस लब के सुनने-सुनाने की रातें

मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत
मुझे याद हैं तेरे आने की रातें

पुर-असरार सी मेरी अर्ज़-ए-तमन्ना
वो कुछ ज़ेर-ए-लब मुस्कुराने की रातें

सर-ए-शाम से रतजगा के वो सामां
वो पिछले पहर नींद आने की रातें

हम-आग़ोशियां शाहिद-ए-मेहरबां की
ज़माने के ग़म भूल जाने की रातें

'फ़िराक़' अपनी क़िस्मत में शायद नहीं थे
ठिकाने के दिन या ठिकाने की रातें
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

444 कविताएं

View Profile