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स्मृति में ले जाती धर्मवीर भारती की कविता 'बरसों के बाद उसी सूने आंगन में'

काव्य डेस्क

Irshaad
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बरसों के बाद उसी सूने- आँगन में 


जाकर चुपचाप खड़े होना 
रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना 
मन का कोना-कोना 

कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना 
फिर आकर बाँहों में खो जाना 
अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी 
फिर गहरा सन्नाटा हो जाना 
दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना, 
कँपना, बेबस हो गिर जाना 

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना 
मन को कोना-कोना 
बरसों के बाद उसी सूने-से आंगन में 
जाकर चुपचाप खड़े होना !


साभार - कविताकोश 
7 वर्ष पहले
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Aditya Mishra

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