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ये हैं दाग़ देहलवी की मशहूर 3 ग़ज़लें...

काव्य डेस्क

Irshaad
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बात मेरी कभी सुनी ही नहीं
जानते वो बुरी भली ही नहीं

दिल-लगी उन की दिल-लगी ही नहीं
रंज भी है फ़क़त हँसी ही नहीं

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं

उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से
कभी गोया किसी में थी ही नहीं

जान क्या दूँ कि जानता हूँ मैं
तुम ने ये चीज़ ले के दी ही नहीं

हम तो दुश्मन को दोस्त कर लेते
पर करें क्या तिरी ख़ुशी ही नहीं

हम तिरी आरज़ू पे जीते हैं
ये नहीं है तो ज़िंदगी ही नहीं

दिल-लगी दिल-लगी नहीं नासेह
तेरे दिल को अभी लगी ही नहीं

'दाग़' क्यूँ तुम को बेवफ़ा कहता
वो शिकायत का आदमी ही नहीं

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वो ज़माना नज़र नहीं आता...

वो ज़माना नज़र नहीं आता
कुछ ठिकाना नज़र नहीं आता

जान जाती दिखाई देती है
उन का आना नज़र नहीं आता

इश्क़ दर-पर्दा फूँकता है आग
ये जलाना नज़र नहीं आता

इक ज़माना मिरी नज़र में रहा
इक ज़माना नज़र नहीं आता

दिल ने इस बज़्म में बिठा तो दिया
उठ के जाना नज़र नहीं आता

रहिए मुश्ताक़-ए-जल्वा-ए-दीदार
हम ने माना नज़र नहीं आता

ले चलो मुझ को राह-रवान-ए-अदम
याँ ठिकाना नज़र नहीं आता

दिल पे बैठा कहाँ से तीर-ए-निगाह
ये निशाना नज़र नहीं आता

तुम मिलाओगे ख़ाक में हम को
दिल मिलाना नज़र नहीं आता

आप ही देखते हैं हम को तो
दिल का आना नज़र नहीं आता

दिल-ए-पुर-आरज़ू लुटा ऐ 'दाग़'
वो ख़ज़ाना नज़र नहीं आता

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है...

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है
दबी दबी तिरे लब से हँसी निकलती है

ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक
कि इस में बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है

बजाए शिकवा भी देता हूँ मैं दुआ उस को
मिरी ज़बाँ से करूँ क्या यही निकलती है

ख़ुशी में हम ने ये शोख़ी कभी नहीं देखी
दम-ए-इताब जो रंगत तिरी निकलती है

हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है

अदा से तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें
निगह निगह से छुरी पर छुरी निकलती है

मुहीत-ए-इश्क़ में है क्या उमीद ओ बीम मुझे
कि डूब डूब के कश्ती मिरी निकलती है

झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद
शजर में पहले समर से कली निकलती है

शब-ए-फ़िराक़ जो खोले हैं हम ने ज़ख़्म-ए-जिगर
ये इंतिज़ार है कब चाँदनी निकलती है

समझ तो लीजिए कहने तो दीजिए मतलब
बयाँ से पहले ही मुझ पर छुरी निकलती है

ये दिल की आग है या दिल के नूर का है ज़ुहूर
नफ़्स नफ़्स में मिरे रौशनी निकलती है

कहा जो मैं ने कि मर जाऊँगा तो कहते हैं
हमारे ज़ाइचे में ज़िंदगी निकलती है

समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर
कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फ़ी निकलती है

दम-ए-अख़ीर तसव्वुर है किस परी-वश का
कि मेरी रूह भी बन कर परी निकलती है

सनम-कदे में भी है हुस्न इक ख़ुदाई का
कि जो निकलती है सूरत परी निकलती है

मिरे निकाले न निकलेगी आरज़ू मेरी
जो तुम निकालना चाहो अभी निकलती है

ग़म-ए-फ़िराक़ में हो 'दाग़' इस क़दर बेताब
ज़रा से रंज में जाँ आप की निकलती है
8 वर्ष पहले
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Sanjai kumar

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