लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहां सोचते हैं
रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं
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रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज
लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज
जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं
हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए
सोचती हूं मैं कहां जा के मुक़द्दर फोड़ूं
मैं न ज़िंदा हूं कि मरने का सहारा ढूंढूं
और न मुर्दा हूं कि जीने के ग़मों से छूटूं
कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूं
ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक
कब तलक आंख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक