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हर्षनाथ पाण्डेय की पांच लोकप्रिय भोजपुरी कवितायें

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            लौटा द हमार गांव
        
                                                    
                            

लौटा द हमार बैलन के घंटी, हमार शकुंतली गाय
हमरा गीतन के तान हमार सभ्यता आ संस्कृति के मान
लौटा द हमार जान
लौटा द कोयिलया के कुहुक पपिहा के पिऊ पिऊ
आ सोन चिरईयां के सीताराम
लौटा द हमार कुल्ह समान
गौरया के चीं - चीं, दुध भरल कटोरा आ
कौआ मामा के कांव कांव
लौटा द तोता तोती के रस भरल तान
लौटा द हमर जंगल हमर हरियाली
दे द हमरा सावन क रिमझिम
तहरा से कुछुवो ना चाहीं
हमार हरिना के चाल हमार बा इहे कहनाम
कि लौटा द हमार बघवा के मनान
लौटा द हमार माटी वोला बडका दालान
एके संग खेत से आके रामायन पढ़त किसान
लौटा द हमार फेंडन के छांव
सिंदूरया ककरिअवा किरसईनियां आ लंगड़ा आम
लौटा द हमार चान
लौटा द हमार संझवत के दियरी हमर बंसवारी
गांव के आहर पोखर पईन गडहा आ गडही
भरवा केराजनीति खेल रहल बाड
गरीबन के किसानन के मरे के विध लगवले बाड
त्त सुन ल पानी नांबांची
त्त पानी नां बांची
लौटा द हमरा जंगल के कुल्ह जड़ी बूटी
हमार बधार के गमक
लौटा द हमार बाग बगईचा आ
गंगा जमुनवा के निरमल पानी
लौटा द हमार भारत के अतित
सजावे के बा वर्त्तमान
लौटा द बूढ़वा बरगदद पुरन का पीपर आ पाकड
नीम आ कदंब ठावें - ठांव
लौटा द हमार मंदिर के घंटी
मस्जिद के आज़ान
लौटा द हमार गांव
लौटा द हमार गांव
लौटा द हमार गांव।

वरदान मांगी

वरदान मांगी मईया वीणा पाणिनी से
नया नया छंद नव गीत बने निस दिन,
ताल वंद आ मिरदंग अम्ब झरे तीसो दिन।
कि शंख, चक्र पद्म हस्त हंसवाहिनी से
वरदान मांगी मईया

हियरा में अविरल ज्योति भर द माई
अंधियारी रतिया अंजोर करऽ आई
कि प्रेम रस शांत स्वर श्री यक्षिणी से
वरदान मांगी मईया

भीतर के पइठल सब शत्रुन संहार दऽ
माई मोर लेखनी क निरमल धार दऽ
कि भारत भुवन के आधार धारिणी से
वरदान मांगी मईया

असरा के दियरी जराई देतु माई
चिदानंद रूपिणी चरन में सिर नाईं
मांगेला 'हरष' तम ताप हारिणी से
वरदान मांगी मईया

 वन बगिया लगाइ द 

देसवा के करीं गुलजार हो
बन बगिया लगाइ द
जीनगी मे आई बहार हो
बन बगिया लगाइ द
किसिम ‐ किसिम के पेड लगाईं जा
परयावरण के जान बचाईं जा
इहे बा अरज सरकार हो
बन बगिया लगाई द
जीनगी में आई

बनराज, बाज नां लउके हिरनवां
गौरयाके'चीं‐चीं' ना चहके अंगनवां
काहें.. हरियर लागेना बाधार हो
बन बगिया लगाइ द
जीनगी में आइ

जंगल बचाईं तबे बाचीऽ धरतीया
आम, बर, पीपल बिना लागी परतीया
चान ‐ सुरूज मजधार हो
बन बगीया लगाइ द
जीनगी में आइ

धरती‐ आकाश के नाता पुरान बा
हिमाला, शिवाला, समंदर हमार बा
ओजोन के परत रखवार हो
बन बगीया लगाइ द
जीनगी में आइ

कुल्ह 'गरू‐माल', नदी, चिरईं बचाईं जा
राखी पहचान गीत गंगा के गाईं जा
'हरष' जीनगी बनिहें रसधार हो
बन बगीया लगाइ द
जीनगी में आइ बहार हो
बन बगीया लगाइ द।

रेशम का गाछिन में

भाषा का सेवक कहाये वोला लोगन जब
संयम ना बरती त्त बरती केे
सभ्यता आ संस्कृति विहिन भला लेख आ कविता का
ग्रन्थन का मंथक भी होखे त्त अधिका का
संघर्ष कइल जरूरी बा
संघर्ष विहिन साहित्य खाली खानापुरी बा
बाकिर शालिनता से भाई जी
आर्यन के खोदी मत मारग अवरोधी मत
सोधी मत कंचन के बार बार आगि में
एकलव्य अंगुठा के मोल का दिआई कबो केकरो सेे

बाकिर ना गुरूभक्ति के साथे एकलव्ये जोडाई द्रुपद ना
कविता संस्कृति के सरिता ह
गीता का श्लोकन के पढे के अभ्यास करीं
साधीं मत जोधा के साहिल के मारे में
आईडियम्स के छेदीं मत
कविता आँखिन से पढल जाले
मुंहन के बदबु सुंघाईं मत साकी के
काव्यन प्रणेता के आंखिन में लोरन से भरि जाले
कविता का लेखन में लर जाले कालजयी चरनन में
देखल नां कबहूं जे सीपी आ सितुहा के
मुंगा आ मोती के मोल भला जानी ऊ
कृष्ण का भारत केे गीता महाभारत के
छेडीं मत स्वारथ में
सानी मत गंगा केे शहरन का नालिन में
फेंड लगाईं अब परयावरन बचाईं अब
'हरष' के निहोरा बा वीणा आ वाणी का पुत्रन से
पेवन मत साटीं अब रेशम का गाछिन में
पेवन मत साटीं अब रेशम का गाछिन में।

भोजपुरिया 

चिन्हियां बा कान्हि प कुदरिया
त भारत के परान भोजपुरिया
होतहीं फजिरवा सिवानवां प लऊके
अनवां से भरल बधरिया बा छऊके
हाथवा में ललकी लउरिया
त भारत के जान भोजपुरिया
चिन्हियां बा

अंगे‐अंगे बडूए उफान के समानवां
छतिया छरके जइसे नागवा क फनवां
सीमवां प लेलेबा बनूकिया
त भारत के शान भोजपुरिया
चिन्हियां बा

माथवा पगरिया साबुज रंग देहियां
रगे‐रगे बसल धरतिया के नेहिया
चलिया बा उफने जवनियां
तs भारत के आन भोजपुरिया
चिन्हियां बा

चनवां नहाएला चननियां इंजोरिया
संगवा में बाडी हो सेजरिया क गोरिया
अंखिया बा पाजल कटरिया
त सिंहवा समान भोजपुरिया
चिन्हियां बा कान्हि पऽ कुदरिया
त भारत के परान भोजपुरिया

(साभार- कविता कोश)
9 वर्ष पहले
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