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इंडीमून्स नाट्य समारोह की दूसरी शाम: मकरंद देशपांडे के 'सर-सर सरला' के नाम

शकील खान

Halchal
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प्रोफेसर अपने घर में बेड पर लेटे हुए हैं। लेफ्ट विंग से शिष्य फणीधर की एंट्री होती है। सरला को लेकर संवाद होते हैं फणी का आरोप है कि प्रोफेसर ने सरला को उससे दूर कर दिया है। अचानक फणी के हाथ में चाकू आता है, चाकू वाला हाथ ऊपर उठता है और प्रोफेसर के प्रति फणी की पूरी नफरत चाकू में समा कर प्रोफेसर पर वार दर वार करती है। प्रोफेसर का कत्ल। यानि खेल खतम पैसा हजम। लेकिन नहीं ये तो शुरुआत दृश्य है और शुरुआत में तो हीरो मर नहीं सकता। सो सुबह होती है, प्रोफेसर नींद से जागते हैं। फणी भी हाजिर है।


एक छोटा-सा दृश्य दोनों के चरित्र को दर्शक के दिमाग में खूंटा गड़ा कर बैठा देता है। सिर्फ इन दोनों को नहीं सरला को भी दर्शकों के दिमाग में स्थापित कर देता है। प्रोफेसर और फणी के चुटीले और रोचक संवाद बताते हैं कि ये आम गुरु-शिष्य नहीं हैं कुछ अलग मिट्टी के बने लोग हैं। नरम-गरम संबंध वाले गुरु और चेला। जिनके बीच गुरु की दूसरी शिष्या सरला को लेकर कुछ लफड़ा है। लेकिन पंद्रह मिनिट (शायद) बीतने को आए सरला तो लापता है।

ढाई घंटे का नाटक है ऐसे कब तक झेलना पड़ेगा? लीजिए सरला भी आ गई। 'सर सर सरला' कहती हुई। बेचैन हो रहे दर्शक के दिल को करार मिलता है और फिर कुर्सी से चिपक जाता है। फिर से दिलचस्प और चुटीले संवादों की झड़ी लगती है और अभिनय के ताजे झोंके से स्टेज का कोना-कोना सराबोर हो जाता है।

पता चलता है कि फणिधर (संजय दधीच) सरला के प्रेम में आकंठ डूबा है। उधर सरला (अहाना कुमरा) अपने प्रोफेसर (मकरंद देशपांडे) प्रेम में डूबी है, आकंठ से भी थोड़ी ज्यादा ही डूबी है। लेकिन क्या प्रोफेसर भी अपनी शिष्या से वैसा ही प्यार करता है जैसा वो उससे करती है।

अभी बता देंगे तो आपका मजा खराब हो जाएगा। लेकिन चलिए रिस्क लेते हैं और बता ही देते हैं कि प्रोफेसर के दृष्टिकोण से उनका और सरला का प्रेम निश्छल है, विशुद्ध गुरु शिष्य का प्रेम। लेकिन यह सरल नहीं मुश्किल प्यार है। नाटककार की मानें तो इस प्रेम की सरहद पर एक दरबान खड़ा है। प्रेम की यह नीट और क्लीन परिभाषा ही 'सर सर सरला' की जान है.   

इस जान में जान डालता है मकरंद देशपांडे का दमदार अभिनय। लेकिन नहीं, सिर्फ मकरंद का नहीं आहाना कुमरा भी अभिनय में कम नहीं थी,  मकरंद से बीस नहीं है तो उन्नीस भी नहीं। आहाना टेलीविजन और फिल्म की अदाकारा हैं सोनी के धारावाहिक 'युद्ध' में अमिताभ के साथ स्क्रीन शेयर कर चुकी हैं।

फणी और केशव भी कम नहीं थे। वैसे ये भी सच है कि,  ये है तो मकरंद का नाटक। लेखक, निर्देशक और मुख्य अभिनेता सभी का भार तो उसके कंधे पर है, और हर किरदार में लाजवाब।

अभिनय के अलावा दूसरी खासियत जो नाटक को प्रभावी बनाती है वो है इसकी डिजाइन। रियल टाइम से फ्लेश बैक, फ्लेश बैक से रियल टाइम और फिर फ्लेश बैक। इधर से उधर होने के इस उपक्रम को संवादों और घटनाओं से इस तरह जोड़ा गया है कि ऊब नहीं होती, उल्टे रोचकता बढ़ जाती है. बेशक इसकी जड़ में किरदारों की दिलचस्प अदाकारी तो है ही, संगीत और लाइट, खासकर लाइट, ड्रामे को रोचक और ग्राह्य बनाने में खास भूमिका निभाता है। रही-सही कसर पूरी कर देती है एंट्री और एक्जिट।

दर्शकों के बीच से कलाकारों की एंट्री-एग्जिट कोई नया प्रयोग नहीं है, लेकिन यहां थिएटर के लेफ्ट विंग के गेट ने निर्देशक मकरंद को बहुत सहयोग किया, जहां से एंट्री-एग्जिट सहज और प्रभावी बन पड़ी थी। क्लाइमेक्स तक आते-आते तो नाटक दर्शकों को अपने मोहपाश में ऐसे जकड़ लेता है मानो घर जाने ही नहीं देगा।

बहरहाल ढाई घंटे बाद मकरंद और उसके साथी कलाकारों के मोहजाल से जब दर्शक आजाद होता है तो तालियों की गड़गड़ाहट से सेलिब्रेट करता है।

इंडीमून्स नाट्य समारोह में सिर्फ नाटक नहीं हो रहे। 'टाॅक शो' और 'बैंड' प्रस्तुति भी होती हैं। बुधवार को क्लब लिटराटी के तहत हुए 'सेंट्रल स्टेज' टॉक शो का विषय था - क्रासिंग द डिवाइड: थिएटर टू सिनेमा' । विभाजन को पार करते रंगमंच से सिनेमा को आवाज देने के लिए उपस्थित पैनलिस्ट में शामिल थे - मकरंद देशपांडे, राजीव वर्मा, बालेन्द्र सिंह बालू और गिरिजा शंकर। संचालन का जिम्मा उठाया युवा रंगकर्मी सौरभ अनंत ने। मकरंद का कहना था मेरे लिए जीवन ही नाटक है, रंगमंच मुझे आकर्षित करता है।

सिनेमा मुझे अलग इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि जो मैं जीवन में कर चुका हूं या मैं हूं, वैसा ही सिनेमा में किरदारों को निभाते समय हूं। रंगमंच करना है तो ईमानदार रहो। राजीव वर्मा के अनुसार थिएटर का एक मकसद होता है जिसका सामाजिक व्यवस्था में अपना स्थान और महत्व है। जबकि सिनेमा मनोरंजन करता है।

बालेन्द्र सिंह बालू कहते हैं थिएटर में आने से पहले ट्रेनिंग लेना जरूरी है इसके अलावा पढ़ना और ढेर सारा पढ़ना रंगमंच की बेसिक जरूरत है। गिरिजा शंकर जी का के मतानुसार दौनों का माध्यम अलग है दौनो एक दूसरे को सप्लीमेंट करते हैं।
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