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छोटी छोटी कहानियों का बड़ा सा 'बोनस' - ज़िंदगी का बोनस

दीपाली अग्रवाल

Book Review
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अगर जाने माने व्यंग्यकार, कवि और साहित्यकार अशोक चक्रधर किसी कृति को साहित्य के लिए ‘बोनस’ बताएं, संवेदन तंत्रिका को झंकृत करने वाला करार दें, उसे प्रमोदक और आज के दौर में सकारात्मकता से भरी हुई कहें तो जाहिर है वह वाकई ‘ज़िंदगी का बोनस’ ही हो सकता है। अशोक चक्रधर जिस तरह हर बात पर चुटकी लेते हैं, उसमें आप समझ नहीं पाते कि सचमुच वो आपकी तारीफ कर रहे हैं या आप पर तंज़ कर रहे हैं। उनका अंदाज़ हर मौके को दिलचस्प बना जाता है। अब बेशक वह मौका किसी किताब के लोकार्पण का हो या फिर कोई और अन्य मंचीय आयोजन।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ सच्चिदानंद जोशी की नई किताब ‘ज़िंदगी का बोनस’ की कहानियों के बारे में टुकड़े टुकड़े में अशोक चक्रधर ने न सिर्फ अपनी राय दी और उसे लेखक के व्यक्तित्व से जोड़ा बल्कि कई रसीले-चुटीले संदर्भ भी पेश किए। गंभीर से गंभीर बात को हंसते हुए कहना और प्रकाशक की बड़े प्यार से उसकी ‘कंजूसी भरी छपाई’ को लेकर खिंचाई करने की कला में भी अशोक जी कितने माहिर हैं, ये इस आयोजन में नज़र आया।

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डॉ सच्चिदानंद जोशी एक बेहतरीन रंगकर्मी रहे हैं, संस्कृति से उनका गहरा नाता रहा है, कविताएं और कहानियां लिखते वक्त उनके भीतर का रंगकर्मी हमेशा मौजूद रहता है। दृश्य जीवंतता के साथ आपके सामने से गुज़रते हुए से लगते हैं। जाहिर है ‘ज़िंदगी का बोनस’ भी उन्होंने यूं ही नहीं लिख दिया। इसकी हर कहानी में उनके अपने अनुभव हैं, वो रिश्ते और संवेदनाएं हैं जो वाकई ज़िंदगी में एक बोनस की तरह उन्होंने हासिल किए हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि उनके साथ, उनकी रचनाओं में तमाम आयामों के साथ उनकी जीवनसंगिनी और रंगकर्मी मालविका जोशी लगातार और ज़रूर मौजूद रहती हैं। शायद वही सच्चिदानंद जोशी के लिए ज़िंदगी का सबसे बड़ा बोनस हैं।

कुछ महीने पहले जब इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में उनसे लंबी बात हुई तो डॉ सच्चिदानंद जोशी ने अपनी किताब भेंट की थी – पल भर की पहचान। छोटी छोटी लेकिन मन के भीतर तक उतर जाने वाली कहानियां। वो तमाम पात्र जो आते जाते उन्हें किसी न किसी तौर पर अपने साथ जोड़ गए, उसे डॉ जोशी ने बेहद खूबसूरती से इस संग्रह में संवेदनशील और दिलचस्प तरीके से पेश किया। उस दौरान उन्होंने बताया कि दंगों की पृष्ठभूमि पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं। बहुत सारा वक्त भोपाल में बिताया, एक ऐसे शहर में जो अपनी गंगा जमुनी तहजीब और संस्कृति के लिए जाना जाता है, वहां दंगों का भयानक दौर भी देखा और मन को विचलित करने वाले कई तजुर्बे भी हुए, जिसे उन्होंने अपनी कहानियों में बेहद संवेदनशीलता के साथ उतारा। ‘ज़िंदगी का बोनस’ में भी उनकी कहानी ‘इफ्तार’ मन को भीतर तक झिंझोड़ती है और आज के माहौल में आपको सोचने को मजबूर करती है।

सच्चिदानंद जोशी ने जब ये कहानी (इफ्तार) अपने संवाद अदायगी वाले भावनात्मक अंदाज़ में सुनाई तो कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही पद्मश्री से नवाज़ी जा चुकी मशहूर कथक नृत्यांगना शोवना नारायण, अशोक चक्रधर, जानी मानी कथाकार अल्पना मिश्र, भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक डॉ संजय द्विवेदी समेत हर कोई मानो उसमें डूब गया।

उसी तरह कोरोना काल में हर किसी की ज़रूरत बन चुके मास्क को लेकर उन्होंने जिस दिलचस्प और चुटीले अंदाज़ में इसकी परेशानियों को पेश किया, वह अद्भुत है। उनके भीतर का व्यंग्यकार मानो जीवंत हो उठा और ये तमाम वाकयात मियां-बीवी संवाद के तौर पर पेश करते हुए डॉ जोशी की रंगमंचीय प्रतिभा जाग उठी। जाहिर है ज़िंदगी के तमाम बोनस में से इसे भी आप एक बड़ा ‘बोनस’ मान सकते हैं जो आपके दर्द, खीझ और परेशानी को बेहद दिलचस्प तरीके से जाहिर करने वाला है।

अब तक 20 से ज्यादा किताबें लिख चुकीं और कथक को अपनी ज़िंदगी बना चुकी  शोवना नारायण इकलौती ऐसी नृत्यांगना हैं जिन्होंने दिनकर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त समेत हिन्दी के तमाम मूर्धन्य कवियों की रचनाओं पर, पौराणिक ग्रंथों के संदर्भों पर अपनी नृत्य संरचनाएं की हैं। ‘ज़िंदगी का बोनस’ शोवना नारायण के भीतर तक उतर गई। किताब पर बोलते बोलते शोवना भावुक हुईं, अपनी कथक शैली में लेखक के व्यापक आयाम और संवेदनशीलता को उन्होंने पेश किया और बताया कि कैसे ये लघुकथा संग्रह चिंतन और मनन के साथ तैयार हुआ है औऱ कैसे सामान्य घटनाओं से सीख लेते हुए मानवीयता, सूक्ष्मता और सूझबूझ के साथ इसमें जीवन जीने का साहस नज़र आता है। अल्पना मिश्र खुद एक जानी मानी कथाकार हैं और उनकी नज़र में डॉ जोशी की कहानियों में ललित निबंध, रिपोर्ताज, कथा और साहित्य के तमाम आयामों की झलक मिलती है। वहीं डॉ संजय द्विवेदी ने भी सच्चिदानंद जोशी के लेखन और व्यक्तित्व के कई पहलुओं की चर्चा की। 

जाहिर है पुस्तक लोकार्पण जैसे समारोह प्रकाशक और लेखक की सामूहिक कोशिशों को नतीजा होता है। कोरोना काल के दौरान जिस तरह दुनिया डिजिटल खोखे में समा गई है, उससे बाहर निकलकर फिर से जीवन जगत में लौटना और इस बहाने लोगों से मिलना जुलना एक नई ऊर्जा पैदा करने वाला तो होता ही है।  

कोरोना काल और लॉकडाउन के दौरान धुआंधार साहित्य रचा गया। कविताओं और कहानियों की बाढ़ सी आ गई। तमाम सोये हुए लेखक जाग उठे और कहीं नहीं तो फेसबुक पर ही अपनी रचनात्मकता के नमूने पेश करते रहे। कोरोना ने नए नए विषय दिए, परिवेश दिया और सोशल मीडिया के तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स लगातार गुलज़ार रहे। अब इन रचनात्मकताओं को समेटने का वक्त है और प्रकाशकों के लिए इस अपार खज़ाने में से चुनी हुई रचनाओं को किताब की शक्ल देने का वक्त है। यह सिलसला पिछले कुछ महीनों से तेज़ हुआ है। प्रभात प्रकाशन अब ऐसी किताबें छापने ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है जो पठनीय हों और जिसे पॉकेटबुक की तरह इस्तेमाल किया जा सके। इसी कड़ी में ज़िंदगी का बोनस भी है। छोटी छोटी कहानियों का बड़ा सा बोनस।
5 वर्ष पहले
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Aditya Mishra

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