कितने चेहरे, कितनी यादें, कितनी घटनाएं, कितने आंसू और कितनी ही हंसी। जीवन में अपने साथ हम कितना कुछ लेकर चलते हैं। रेखाचित्र इन्हीं स्मृतियों को शब्दों में संजोने का नाम है। रेखाचित्र एक तरह से स्मृतियों की फोटोकॉपी ही तो है। रेखाचित्र हिंदी साहित्य की एक भूली-बिसरी विधा है। इस विधा में शब्दों के माध्यम से शब्द-चित्र बनाए जाते हैं। ऐसी ही विन्यासों से सजी किताब है 'रेखाएं बोलती हैं, भाग-2'। किताब में हिंदी के कई लेखकों की स्मृतियों को संजोया गया है।
रेखाएं बोलती हैं, भाग-2
संपादन- गीताश्री
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर
मूल्य- 250 रुपये