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मन: मन का बोया, शब्दों में पिरोया

दीपाली अग्रवाल

Book Review
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मन के हारे हार है मन के जीते जीत, कबीर के इस दोहे का सार यही है कि सब कुछ हमारे मन पर निर्भर करता है। हमारे गुजरे कल की कसक, आने वाले की चिंता, अच्छे-बुरे का अहसास, डर, सब कुछ मन पर ही है। हमारे अंदर के सवालों को अक्सर अनसुलझा ही छोड़ देते हैं। कई बार कुछ गलतफहमियों के शिकार भी होते हैं। मन विचरता भी है। यह कभी स्थिर नहीं रहता, पर उसकी हर अवस्था में सच का अस्तित्व दिखता है। कहते हैं, जो दिखे, तो सच होगा, जो न दिखा तो मन होगा।




किताब- मन
लेखक- संदीप
प्रकाशक- नोशन प्रेस डॉट कॉम, चेन्नई
मूल्य- 299 रुपये
7 वर्ष पहले
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