''अगर सभ्यता को प्रगति करनी ही थी तो इस ओर करना चाहिए था कि किसी के सामने उसका कोई प्रिय मार न दिया जाए, गायब न कर दिया जाए। डेढ़ सौ वर्षों में हम इतना भी नहीं कर पाए थे। अनसूया के पास जाकर मैं बताता भी तो क्या बताता? यह कि रफ़ीक का पता लगाने के साथ हमसे उसके जीवन पर रच दी गई कहानियों का जाला साफ़ करना क्या कभी संभव हो पाएगा। उसकी डायरी, उसके नोट्स, पटकथाऍं सब सच बतला रही थीं लेकिन सबकी पहुंच के दायरे में अखबार थे, पुलिस थी, मोर्चा था, नरमेधी महत्वाकांक्षाएं थीं।'' (पृष्ठ 140)
-'वैधानिक गल्प' के औपन्यासिक वृत्तांत में इस एक टिप्पणी के सिवा कहीं लेखक बोलता नहीं नज़र आता। कोई आप्त वाक्य नहीं, कोई निष्कर्ष नहीं---बस सारे डिटेल्स, सारे दृश्य, सारी कुटिलताएं उसके जेहन में दर्ज होती हैं। वह एक अकेले रफ़ीक के विरुद्ध खड़े समाज का भाष्य सिलसिलेवार टॉंकता चलता है। पर उसके इस नैरेशन में ही इस पूरे उपन्यास का सार छिपा हुआ है।
दुनिया दिनोंदिन कितनी बदलती और उग्र होती जा रही। अंतर्जातीय विवाह को संस्कृति के शुचिताग्रही आज कितने संदेहों से देखते हैं कि उस पर 'लव जेहाद' का लेवल चस्पा करने में देर नहीं लगाते। एक छोटे कस्बे में कोई बुद्धिजीवी पहुंच जाए तो उसकी खैर नहीं। प्रोग्रेसिव है तो और आफत। वह एक बेहतरीन अध्यापक के रूप में पहचान बनाए और धर्म और अज्ञान के ठेकेदारों की कारगुजारियों का नाटक के जरिए पर्दाफाश करे यह सहन कर पाना कस्बे के छुटभैयों और पंक्तिपावनों को कहां बर्दाश्त होगा। उपन्यास में रफ़ीक़ इसी साजिश का शिकार है।
आपके पास आधी रात सुदूर कस्बे से किसी पूर्व परिचिता का फोन आए। वह अपने पति की गुमशुदगी के बारे में बता कर मदद मांगे। पता चले वह स्त्री कभी आपकी दोस्त रही है। आप कर्तव्यवश उस कस्बे में जाते हैं। पुलिस से तहकीकात को कहते हैं। एफआईआर न लिखने में पटु पुलिस स्थानीय मीडिया में वही छपवाए जो वह चाहती है। वह यह भी प्रवाद फैलाने में कामयाब हो कि रफीक की पत्नी से कहीं न कहीं आपकी भी संलिप्तता है। रफीक के साथ के लोग भी धीरे धीरे रहस्यमय तरीके से गायब कर दिए जाएं तब आप लाख रफीक की डायरी के पन्नों को सीक्वेंस में जोड़ कर देखें कि वह कितना नेकदिल और इन्टेलेक्चुअल था, पर कस्बे के दुष्ट लोग कहां मानने वाले। 'वैधानिक गल्प' के भीतर का किस्सा यही है।
कस्बों के बदलते हुए आपराधिक चरित्र की यह किस्सागोई निश्चय ही केवल पठनीय ही नहीं, उन व्याधियों की ओर भी इशारा करती है जो पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यकों को लेकर समाज में पनपी हैं। चंदन पांडेय हौले हौले उस जड़ीभूत साइको के भीतर प्रवेश करते हैं जिसने समूह को यहां तक कि पढ़े-लिखे वर्ग को भी अपनी गिरफ्त में लिया है। एक बैठक में पढा जा सकने वाला उपन्यास जिसमें प्रयोगशीलता के छिलके कम हैं, किस्सागोई के गूदे अधिक । सच कहें तो सुख मिला पढ़ कर। उस लेखकीय दृष्टि से भी आश्वस्ति हुई जो बदलते हुए समाज को लेकर सयानी और चौकन्नी है।
'वैधानिक गल्प' की कहानी आज की दुनिया में एक आम कहानी की तरह है। एक व्यक्ति रफीक जो धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग का है, इंटेलेक्चुअल है, रंगकर्म में जिसकी दिलचस्पी है, जिसने संयोग से गैरधर्म की युवती से प्रेम विवाह किया है वह स्थानीय काॅलेज में अध्यापक होने के बावजूद लोगों की आंख की किरकिरी की तरह होता है जो आसानी से उस समाज में सह्य नहीं होता। इन्हीं कुचक्रों के कारण उसे गायब कर दिया जाता है। ऐसे में अचानक रफ़ीक के लापता होने की सूचना रफ़ीक की पत्नी अनसूया लगभग आधी रात अर्जुन कुमार को फोन पर देती हुई मदद की गुहार करती है जिससे उसकी कभी गहरी दोस्ती रही है।
अरसे बाद फोन पाकर अर्जुन पत्नी अर्चना की सलाह पर उसकी मदद के लिए देवरिया के नोमा नामक उस कस्बे में पहुंचता है। पुलिस से मिलता है, जहां का रवैया घोर उदासीनता का है, जैसा कि पुलिस थानों में अक्सर होता है। रसूख न हो तो आपकी रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। कोई कार्रवाई नहीं होती। दबंगों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बावजूद उसकी गुमशुदगी के पीछे कुछ अलग ही लव जेहाद या चरित्रहीनता जैसी कहानियां गढ़ ली जाती हैं या यह कि इसमें ससुराल वालों की कोई खुरपेंच होगी।
उसी समय के आसपास उसके नाटक में भाग लेने वाली शिष्या जानकी भी कहीं लापता है तो आसानी से रफ़ीक का नाम उसे भगाकर कहीं ले जाने के लिए जोड़ दिया जाता है और बिना घटना की तह में गए या गहरी तहकीकात के अभाव में ही ऐसी खबर भी नमक मिर्च लगाकर स्थानीय अखबार में छपवा भी दी जाती है।
आखिर कोई ऐसा प्रेमविवाह क्यों करे जो समाज विरुद्ध है। यह तो हिमाकत है ऐसे बंद समाज में। इसके साथ ही अनेक स्वयंभू प्रवक्ता आपको पग पग पर मिलेंगे जो इसके साइड इफेक्ट्स पर बातें करेंगे। अर्जुन कुमार कस्बे में पहुंचता है तो ऐसे हर मोड़ से गुजरता है, बीच में रफ़ीक के कुछ और लोग गायब होते हैं । एक होटल में शरण लिए अर्जुन अंत तक वह एक संशय में रहता है कि पता नहीं पुलिस क्या करेगी, लोगों की दृष्टि मलिन है ही प्रगतिशील विचार के तथाकथित विधर्मी रफीक़ के प्रति।
ऐसा लगता है कस्बे के लोग, पुलिस सब आपस में इस दुरभिसंधि में मिले हैं। कथा सूत्र ऐसे ही आगे बढ़ता है पर जहां यथार्थ में रफ़ीक का चरित्रहनन होता है, रफ़ीक के वास्तविक चरित्र की ऊंचाइयों के विवेचन के लिए अर्जुन कुमार ने उसकी डायरी के मैले कुचैले अधभीगे पन्ने सामने रखे हैं । उनके अवलोकन और पाठ विश्लेषण से यह सिद्ध होता है कि रफ़ीक लंपट नहीं, एक पढ़ाकू, रंगकर्मी, बुद्धिजीवी है, मुहब्बत के हक में उसने एक हिंदू लड़की से शादी की है पर इसके पीछे कोई लवजेहाद वाला मामला नहीं है। उसकी पत्नी अनसूया गर्भवती है व पति की गुमशुदगी से दहशत में है। पर दुनिया है कि उसके लिए रफ़ीक एक नंबर का चालू है।
कहानी का ढांचा पारंपरिक है। किस्सागोई अपने पाठ के प्रवाह में बहती और बहाती हुई। चंदन कहानियों में जिस तरह के मनोविश्लेषणवादी पाठ के हामी दिखते रहे हैं वह विशेषज्ञता यहां उभर कर सामने आई है। पुलिस थाने, सिपाहियों, कस्बे के सम्मानित लोगों, पुलिस के ही एक सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति शलभ व रफीक़ के मददगार साथियों -- सबका चित्रण बहुत जीवंतता से किया है। कहानी को धीरज से उठाते हुए तथा हर चरित्र पर वाजिब फोकस करते हुए चंदन पांडेय ने अपने इस हुनर को कहीं भी ढीला या निष्कवच नहीं पड़ने दिया है।
हमारे देश में रहने वाला मास पढ़ाई लिखाई के बावजूद कितना कूप मंडूक और अंधविश्वासी या सांप्रदायिक घृणा में दीक्षित हो चुका है कि वह किसी निर्दोष व्यक्ति को भी नहीं बख्शता। राजनीतिक स्वार्थ ने इस घृणा को एक टूल की तरह विकसित किया है। धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक प्रस्तावन के बावजूद ऐसा लगता है कि हमारे देश का पढा लिखा व कम पढा लिखा हर वर्ग जैसे सांप्रदायिक संकीर्णता का शिकार हो चुका है। चंदन का यह उपन्यास इस कहानी के साथ साथ उस समाज के जटिल मनोविज्ञान को भी पढ़ने का यत्न करता है जैसे एक समाजशास्त्री हिंसक व कुटिल होते हुए समाज को पढ़ता है।
सारा कुछ अवैधानिक गैर सामाजिक किस्म के रवैये के बावजूद यदि चंदन पांडेय ने इसे वैधानिक गल्प की संज्ञा दी है तो यह कहीं न कहीं इस व्यवस्था पर तंज भी है। कैसा वैधानिक गल्प है यह जहां हर चीज के पीछे अवैधानिकता है। कानून हाथ में लेने की स्वतंत्रता है। जहां सीधा सच्चा और कानून का अनुयायी होना दुर्गण है। जहां सांस्कृतिक पुलिसिंग में ही समाज का लुंपेन वर्ग लगा है। चंदन की भाषा में अमूर्तन किस्म की बंदिशें नहीं हैं, हालात को बूझने समझने और एक लेखकीय संवेदना से आंकने की कोशिश दिखती हैं। हम इसे आज के समय का यथार्थ कह सकते हैं जो चल रहा है उसका जायज़ा एक ऐसी कहानी के माध्यम से होता है जहां समाज उत्तर आधुनिकतावादी प्रगति के बावजूद अपने असामाजिक, अननुमन्य व अवैधानिक आचरण में संलग्न है। वह इस सनातन धारणा का अनुयायी हो चला है जो यह जताती आई है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है सो उसे तालाब से निकाल फेंकना चाहिए। उपन्यास के केंद्र में अर्जुन कुमार है जो कस्बाई क्षुद्रताओं तथा एक एक कर रफ़ीक के दोस्तों सहयोगियों को गायब किए जाने के इस कठिन समय में भी रफ़ीक की गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़ कर वापस दिल्ली नहीं लौटता जैसे कि वह तुलसी के इस कथन ' होहिं सुबंधु कुठाउँ सहाये' का प्रमाण दे रहा हो।
उपन्यास पढ़ते हुए अरसे पहले मुक्तिबोध की कविता पंक्ति 'सब चुप साहित्यिक चुप' की अनुगूंज सुनाई देती रहती है। बेशक यह कोई मेगा नैरेटिव नहीं है किन्तु एक लकवाग्रस्त होते समाज की स्कैनिंग तो है ही जिसकी बुनियाद में हिंसा जुगुप्सा और घृणा का वायरस भरा है। चंदन पांडेय को इन व्याधियों को चिह्नित करने के लिए बधाई।
वैधानिक गल्प (उपन्यास), लेखक: चंदन पांडेय,
राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, संस्करण 2020,
पृष्ठ 142, मूल्य रु.160/-
(डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि आलोचक एवं भाषाचिंतक हैं।)
5 वर्ष पहले