(यह समीक्षा मुकुल अमलतास द्वारा लिखी गई है )
'चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल' पुस्तक से गुजरना समकालीन कविता के एक दिग्गज कवि के समग्र व्यक्तित्व और उसकी कवि-संवेदना के बहुत पास से होकर गुजरना है। यह पुस्तक हमें साक्षी बनाता है इस बात का कि एक बुलंद लेखकीय शख्सियत कैसे बनती है, वे ईंट और गारे कौन होते हैं, वे गुणधर्म क्या हैं जो कवि-संवेदना को पोषित कर उसे दृढ़ता प्रदान करते हैं! इस पुस्तक के लेखक डॉ.ओम निश्चल जी एक ऐसे आलोचक हैं जिनकी समकालीन कविता के आरोह-अवरोह पर सदैव निगाह रहती है तथा उसके नब्ज़ को वे कभी अपने हाथों से छूटने नहीं देते। उनका मानना है कि समय कला का सबसे बड़ा मानक होता है और यह बात कविता पर भी लागू होती है।
ओम निश्चल इस पुस्तक में पहले ही लेख से इस काल रूपी कसौटी पर इस कवि-व्यक्तित्व को कसते और परखते नज़र आते हैं। इस पूरे लेख का लक्ष्य सातवें दशक के उत्तरार्ध से, जब से अरुण कमल का काव्य संसार विस्तार पाता है, घटित उन महत्वपूर्ण घटनाओं और परिस्थितियों की पड़ताल है जिन्होंने उन्हें वैचारिक रूप से उद्वेलित कर कवि रूप में स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई है चाहे वह आपातकाल हो, सोवियत संघ का विघटन हो, आर्थिक सुधार, भूमंडलीकरण या फिर पूंजीवादी वर्चस्व। कवि अरुण कमल इन्हीं परिस्थितियों की उपज हैं और उनकी कविताएँ उसका प्रस्फुटन।
साठोत्तरी कविता के बड़े हस्ताक्षर अरुण कमल जी को पढ़ना एक अनूठे अनुभव से गुजरना है कुछ-कुछ ऐसा जैसे गाँव की पगडंडी पर बेफिक्र होकर विचरणा, सामने धान और सरसों की हरीतिमा देख आह्लादित होना और फिर उसी रास्ते से गुजरते आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी ग्रामीण समाज की दुर्गति देख खिन्न और उदास होना। अरुण कमल जी ने भले सत्तर के दशक में लिखना शुरू किया हो पर वे आठवें दशक से एक गंभीर कवि के रूप में अपनी पहचान बनाते दिखते हैं। अपनी पहले कविता संग्रह 'अपनी केवल धार' से ही वे चर्चा में आए और खूब आए। उनकी कविता की यह धार आगे भी कायम रही और समय बीतने के साथ उस पर और सान चढ़ता गया और उसकी तीक्ष्णता कभी भोथड़ी न हुई, तभी तो लेखक ने उन्हें कविता का कामगार कहा है। उनकी कविताओं में प्रेम का रोमांच और जज्बात भले न हो पर वह ऐसी उर्वर भूमि की तरह हैं जिसमें दीन दुखियों की संवेदना के अँकुर फूटते हैं।
'उत्तर जीवन की धूप' में लेखक ने अरुण कमल की विभिन्न संग्रहों की कविताओं का उद्धरण देते हुए उनकी कविता के स्थापत्य को समझने का प्रयास किया है। वह कहता है कि अरुण कमल भले ही वामपंथी विचारधारा के समर्थक हों पर वे एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी वैचारिक पेशबंदी को कभी भी कविता के स्थापत्य में आड़े नहीं आने दिया और जिसे सच्चे अर्थों में प्रगतिशीलता कहते हैं उसे अपने कवित्व विवेक में अहमियत दी। आज जब सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद का बोलबाला है; ऐसे परिदृश्य में भी वे अपनी कविताओं के माध्यम से धर्मांध शक्तियों की पहचान करने के साथ-साथ प्रगतिशीलों की भी जांच-जिरह करते नजर आते हैं। यह एक ऐसा कवि है जो मनुष्य को उसके रंग, वर्ण, जाति, संप्रदाय से अलग सिर्फ एक मानवीय इकाई के रूप में देखता है, हाशिए पर पड़ी आवाज को सुनता है और उसे अभिव्यक्त करना ही अपना कवि धर्म मानता है। लेखक कई कवियों के अलावा अरुण कमल के समवर्ती और समान प्रदेश में निवास करने वाले आलोक धन्वा और ज्ञानेंद्रपति की कविताओं तथा उसके गुणधर्मों के साथ उसकी कविताओं की तुलना करता भी नज़र आता है।
लेखक कवि के इस विचार को बार-बार उद्धृत करता है कि जब देश में कोई विपक्ष ना बचा हो तब कविता ही विपक्ष का मोर्चा संभालती है, कविता जीवन का अंतिम मोर्चा, अंतिम चौकी है और निष्कर्ष यह कि यह कवि धन की तरफ ले जाने वाली सफलता का पक्षधर नहीं, चेतना के स्तर पर उत्कर्ष और उदारता का हिमायती है। लेखक कहता है कि भले दुनिया मानती हो कि मार्क्सवादी विचारधारा मर चुकी है परंतु जब तक दुनिया में भूख है, गरीबी है, पूंजीवाद और वर्गभेद का विरोध कैसे बंद हो सकता है । प्रतिरोध का स्वर तो उठता ही रहेगा। कवि की यह कविता प्रतिरोध और प्रतिपक्ष की आवाज नहीं तो और क्या है -
नहीं यह चुप बैठने का समय नहीं
संभालो अपने टूटे बिखरे औजार
हमारे हथियार कमजोर हैं पर पक्ष मजबूत
चारों तरफ से फिर उठ रही है वो पुकार
नए कंठों से
नहीं आत्महत्या नहीं ओ विदर्भ तेलंगाना के किसानों
उठो और छूरी की धार को उलट दो
धर्मो, जातियों, बोलियों में बंटे लोगों
देखो कि सबके कपड़े फटे हैं
सब बेकार बेहाल हैं
सब के घाव हैं गहरे
रोटियां सब की छोटी हो रही है।
'एक रात जब मैं सफर में था' कविता पढ़ कर ऐसा असर होता है जैसे अंदर कुछ कट गया हो पर क्या यह पता नहीं, पाठक निर्विचार आकाश में कुछ ढ़ूँढता रह जाता है। यह कवि की व्यंजना शक्ति है जो मर्मांतक चोट करती है, अपरोक्ष रूप से गरीबी का इतना हृदय विदारक चित्र उपस्थित करना एक सिद्धहस्त कवि के ही वश की बात है।
पुस्तक कवि के साथ साक्षात्कारों से संपन्न है। एक कवि के जीवन काल में ही उसे समझने के लिए उसकी रचनाओं को पढ़ने के साथ-साथ उसके साथ बैठकी कर उसको स्वयं उसी की नजर से जानने का जब प्रयत्न किया जाता है, उसकी रचना प्रक्रिया तथा उसके गूढ़ार्थ और अंतर्भाव तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है तो यह एक बड़ा ही अनूठा और अद्भुत अवसर होता है, जिसके लिए न सिर्फ आने वाली पीढ़ी वरन इतिहास भी उस व्यक्ति का कृतज्ञ होता है जो यह अवसर पैदा करता है। ओम निश्चल जी ने यही वरेण्य कार्य किया है। इस पुस्तक के माध्यम से अब कोई भी साहित्य प्रेमी अरुण कमल के व्यक्तित्व और कृतित्व से अवगत हो सकता है तथा उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को देख, समझ और परख सकता है। ओम जी के इस कार्य के लिए निश्चय ही हिंदी साहित्य उनका ऋणी रहेग।
पुस्तक में कवि के साथ लेखक द्वारा लिए गए तीन साक्षात्कार शामिल हैं। मैंने गौर किया कि हर बैठक में लगभग 10 वर्षों का फासला है। पहला साक्षात्कार वागर्थ पत्रिका के लिए 2002 में लिया गया है, दूसरा वसुधा के लिए 2011 में और तीसरा 2021 में। समय के इतने लंबे अंतराल के बीच किसी रचनाकाल को समझने का प्रयास करना मुझे लेखक द्वारा किया गया एक अनोखा प्रयास लगा। इक्कीस वर्षों का समय तो एक युग बदलने जैसा है, इस दौरान पूरी दुनिया न जाने कितने उठापटक से गुजर चुकी, जो नवयुवक थे बुजुर्ग के की श्रेणी में आ चुके, जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों से गुजरते हुए न सिर्फ कवि के बाल सफेद हो चुके वरन न जाने कितने आस विश्वास में सेंध लग चुकी। ऐसे में कवि के विचार और उसकी विचारधारा में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। पर आश्चर्य, ओम निश्चल अपने प्रश्नों के माध्यम से इन परिवर्तनों को जानने में जुटे रहे। न सिर्फ कवि के जीवन इतिहास को समेटा वरन उत्तरोत्तर प्रखर होते उनके रचनाकर्म तथा रचना प्रक्रिया पर अपनी पूरी पकड़ बनाए हुए अपने बारीक प्रश्नों के माध्यम से उन्हें जानने की कोशिश में निरंतर संलग्न दिखते हैं।
इन साक्षात्कारों के संबंध में ओम जी का कहना है कि बातचीत विचारों की एक सहयात्रा है और उनका उद्देश्य सिर्फ कागद कारे करना नहीं वरन दोनों द्वारा किसी ठोस गंतव्य पर पहुँचना था। न सिर्फ़ कवि की कोमल सांद्र अनुभूतियों से अवगत होना वरन उसके साथ-साथ उसकी अटल विचारधारा से भी रूबरू होना था। इन विचारों को पढ़ते हुए मेरे मन में सवाल उठ रहे थे कि क्या जीवन में कुछ अटल भी होता है? अब मेरी उत्सुकता उसे जानने में थी। जाति पूर्वाग्रह पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने जो कहा वही वह अटल और कवि के मूल में स्थित विचार लगे जो इन शब्दों में प्रकट हुए कि हर श्रेष्ठ कविता व्यक्ति के सभी आवरणों व छिलकों को उतारकर बीज रूप में वह जो प्राणी है उसी को संबोधित होती है, कवि होने का अर्थ ही है सभी सामाजिक चिप्पियों को हटा देना। वैसे उनकी कविता 'किस की ओर से'⁷ अपने आपमें पर्याप्त है लेखक के पक्ष को रखने के लिए जो इस बात का प्रतीक है कि कविता ही कवि का प्रतिबिंब है जिसकी चर्चा ओम जी ने अपने अगले प्रश्न में ही कर दिया है, अन्य सभी सामाजिक चिप्पियां तो शरीर पर डाले हुए पोशाक भर।
कवियों की जन्मशती मनाए जाने के प्रश्न पर उनके द्वारा दिए गए इस जवाब ने मुझे उनका कायल बना दिया कि यह आयोजन हमारे आलोचनात्मक विवेक को जागृत करने के स्थान पर हमें श्रद्धानत करता है जिसके वे पक्षधर नहीं क्योंकि पितर तो हमारे रक्त में विराजते हैं। इस साक्षात्कारों में कवि के जीवन से संबंधित व्यक्तिगत प्रश्नों के अलावा कवि और कविता का प्रयोजन, उसकी प्रासंगिकता, लेखन प्रक्रिया तथा इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक तत्वों पर भी प्रश्न पूछे गए हैं। इन साक्षात्कारों के बारे में यही कहूँगी कि ये अरुण कमल नामक कवि पुष्प की न सिर्फ एक-एक पँखुड़ी को उधेड़ कर की गई शिनाख्त है वरन उसके नाभि नाल तक पहुँच उसके उत्स व सत्व को जाने का भी प्रयत्न भी है।
'चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल : आलोचना और आपद्धर्म' इस पुस्तक का एक अहम आलेख है जो अरुण कमल के लेखकीय व्यक्तित्व के आलोचनात्मक पक्ष को उजागर करता है। ओम जी का मानना है कि अरुण कमल जी के लिए आलोचना एक आपद्धर्म रहा है फलत: आलोचनाएं प्रायः संपादकों के अनुरोध पर ही लिखी गयी हैं, अतः आलोचना उनके लिए स्वतःस्फूर्त नहीं रहा है और यही कारण है कि उनके आलोचनात्मक लेख में हम कोई क्रमबद्धता नहीं पाते। परंतु जब भी उन्होंने इसके लिए कलम उठाई, कुछ अमूल्य ही दिया। अंग्रेजी के अध्यापक होने के नाते वे यूरोपीय आधुनिकता और पश्चिमी आलोचना पद्धति के भी मर्मज्ञ हैं परंतु उन्होंने अपने लेखन पर कभी भी इसका प्रभाव नहीं पड़ने दिया तथा सदैव भारतीय साहित्य और संस्कृति में समाविष्ट तत्व को ही अपनी आलोचना का आधार बनाया। इनकी आलोचना सदैव आधुनिक भारतीय साहित्य के निर्माताओं को केंद्र में रखती है जिन्होंने अपने साहित्य में सदैव उस मनुष्य को प्रतिष्ठित किया है जो अकिंचन और सताया हुआ है। तभी तो वे कहते हैं कि हिंदी कविता कुलिनों की कविता नहीं हो सकती, वह विपन्नता के बखान में ही अपनी अभिव्यक्ति की सार्थकता पाती है।
अंत में बस यह कि ‘चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल’ लिखकर ओम निश्चल ने साहित्य जगत को एक अनमोल उपहार दिया है, एक ऐसी पुस्तक जिसे पढ़कर हम अरुण कमल जी के लेखकीय व्यक्तित्व के आर पार झांक सकते हैं, उन्हें जान समझ सकते हैं।
अरुण कमल एक अनुवादक भी रहे हैं और उन्होंने देश और विदेश के अनेक साहित्यकारों की कविताओं तथा लेखों का अनुवाद किया है वियतनामी कवि तो हूं की कविताएँ,मायकोव्स्की की आत्मकथा तथा किपलिंग की जंगल बुक का उन्होंने अनुवाद किया है। तो उनके इस अनुवादक रूप की चर्चा भी अलग से एक अध्याय में होती तो यह पुस्तक अरुण कमल के व्यक्तित्व को और भी समग्रता से पेश करने वाली पुस्तक बन जाती, इसे पढ़ने के दौरान एकमात्र यही कमी खली। वैसे ओम निश्चल जी की मेहनत और धैर्य की सराहना की जानी चाहिए उन्होंने इस कवि व्यक्तित्व को कई वर्षों तक धैर्यपूर्वक जानने समझने की कोशिश की और अंततः इतने श्रम से अर्जित उपादानों को एक श्रेष्ठ पुस्तक में तब्दील कर दिया जो अब साहित्य जगत की एक धरोहर है।
पुस्तक- चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल;
लेखक- डाॅ ओम निश्चल,
रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज,
प्रथम संस्करण 2022, मूल्य 195 रुपए
3 वर्ष पहले