किताब - बेरोज़गार इंजीनियर और गूंगी गन का इंसाफ़
लेखक - विश्वास शर्मा
मूल्य - 259 रूपये
समीक्षक - मयंक जैन परिच्छा
अपराध (नॉयर) और रहस्य कथाओं का हमेशा से एक स्थायी पाठक वर्ग रहा है, जो ऐसी कहानियों का बेसब्री से इंतज़ार करता है। इन कहानियों का अपना एक अलग आकर्षण और मनोरंजन है, जो पाठकों को अपनी ओर खींचता है।
पिछले एक दशक में, जब सोशल मीडिया और स्क्रीन के नशे ने पढ़ने की आदत को बहुत अधिक प्रभावित किया है, तब ऐसे उपन्यासों की और भी ज़्यादा आवश्यकता महसूस होती है, जो लोगों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सुख और आनंद (प्लेजर) के लिए पढ़ने को प्रेरित करें।
इसी श्रेणी में हिंदी के पटकथा लेखक और निर्देशक विश्वास शर्मा का पहला उपन्यास बेरोज़गार इंजीनियर और गूँगी गन का इंसाफ़ उल्लेखनीय है। यह उपन्यास केवल एक मनोरंजक कहानी के रूप में नहीं लिखा गया, बल्कि एक चलचित्र का उपन्यास रूपांतरण प्रतीत होता है, जो पाठकों को न केवल पढ़ने का आनंद देता है, बल्कि उन्हें कहानी से आत्मीयता से जुड़ने का अवसर भी देता है।
इस कथा में कई पात्र हैं, जो अपनी-अपनी कहानियाँ इसमें जीते हैं। केंद्र में है राघव, जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है—एक बेरोज़गार इंजीनियर, जिसने एक हत्या देख ली है। इसके साथ ही है एक “गूंगी गन” जो इंसाफ़ करती है; मनचंदा नाम का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिसवाला, जो अपने आप को बुराई से भरा समझता है लेकिन उसमें भी कई अच्छाई की परतें हैं; एक बिल्डर और उसके गुंडे; जेलर कुर्रे, बाबू दिलवाला नाम का अपराधी है, जो मनचंदा को मारने के लिए जेल से थोड़े समय के लिए रिहा होता है, और राघव की प्रेमिका, जो उसके लगातार झूठ से परेशान है। इन सबके बीच बेहद सधा हुआ लेकिन शानदार एक्शन है।
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उपन्यास की रफ़्तार पहले ही अध्याय से तय हो जाती है और वही लय पाठक को एक दिलचस्प, मनोरंजक यात्रा पर ले जाती है। भाषा सरल और सहज है, आम बोलचाल के रूपक और शब्दों का सुंदर प्रयोग उपन्यास को और अधिक पठनीय बनाता है। उदाहरण के लिए, जब पहले ही अध्याय में मनचंदा अपना पहला एनकाउंटर करता है और उसकी “नथ उतर जाती है”, यह एक बेहद दिलचस्प रूपक है, जो कथा का टोन सेट कर देता है।ऐसा ही आनंद, यह उपन्यास हर प्रष्ठ पर देता है।
पिछले दो दशकों में, जब टीवी धारावाहिक, फ़िल्में और अपराध-केंद्रित समाचार कार्यक्रम लोकप्रिय हुए, तब भारतीय अपराध और रहस्य लेखन की दिशा भी बदली है। हिंदी में पहले जहाँ यह शैली केवल सनसनीख़ेज़ और उत्तेजक कथाओं तक सीमित थी, और अक़्सर पल्प या लोकप्रिय साहित्य कहकर सीमित कर दिया जाता था, वहीं अब इसमें कई परतें जुड़ चुकी हैं। गैंग और प्रतिद्वंद्विता के साथ-साथ जाति, वर्ग और लिंग जैसे सामाजिक तनाव भी इन कथाओं में गुंथे जाने लगे हैं।
शर्मा का यह उपन्यास तीन वजहों से आकर्षक है, पहला, इसका दृश्यात्मक स्वरूप, जिसमें पात्रों और घटनाओं को फ़िल्मी अपराध कथा का रंग मिला है; दूसरा, इसका विन्यास, जिसमें फ़िल्मी गति और ठहराव का संतुलन है; और तीसरा, इसकी सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा।
बेरोज़गार इंजीनियर और गूँगी गन का इंसाफ़ इसका बेहतरीन उदाहरण है कि किस तरह सरल साधनों से भी एक बहुस्तरीय कथा रची जा सकती है। यहाँ राघव मुख्य पात्र होते हुए भी उपन्यास का केंद्र नहीं है; न ही गूँगी गन। यह एक विस्तृत और बहुपरत कथा है, जिसमें हर पात्र अपनी ठोस भूमिका निभाता है। शर्मा ने इन्हें जिस तरह बुनकर प्रस्तुत किया है, वह हिंदी अपराध कथा लेखन के लिए उम्मीद जगाने वाला है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद यह आशा स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है कि शर्मा आगे भी लिखेंगे, और साहित्य में ऐसी ही उत्कृष्ट अपराध कथाएँ सामने आएँगी।
जहाँ अंग्रेज़ी में विक्रम चंद्र, नीलांजना रॉय, अंकुश साइकिया और तनुज सोलंकी जैसे लेखक अपराध कथाओं को बेहतर तरीक़े से कहकर साहित्यिक हलकों में ला रहे हैं। जिसमें से विक्रम चंद्र का उपन्यास सेक्रेड गेम्स जैसी सीरीज का स्वरूप ले लेता है, और बहुत लोकप्रिय होता है। वहीं हिंदी में भी इस तरह के नए लेखन की और भी ज़्यादा ज़रूरत है।
ऐसे उपन्यास जो केवल “ईगो रीडिंग” या “शो-ऑफ़ रीडिंग” के बजाय वास्तविक पाठन-सुख दें; जिन्हें पाठक एक ही बैठक में पढ़ जाए और आगे पढ़ने की लालसा जाग उठे, जो पाठकों को इंस्टाग्राम रील के कुँए से दूर ले जाय। हिंदी के लिए ऐसे उपन्यास नए दरवाज़े खोलते हैं। इनके ज़रिए वे पाठक, जो सामान्यतः केवल किसी लेखक के सम्मान या पुरस्कार के बाद ही साहित्य तक पहुँचते हैं, धीरे-धीरे साहित्य से जुड़ने लगते हैं और एक सशक्त, जीवंत पाठक-वर्ग का निर्माण होता है।
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