अमर उजाला शब्द सम्मान-2025: ममता कालिया और अरमबम ओंगबी को 'आकाशदीप', इन्हें मिला श्रेष्ठ कृति सम्मान

काव्य डेस्क

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अमर उजाला शब्द सम्मान के सर्वोच्च अलंकरण 'आकाशदीप' से विख्यात कथाकार ममता कालिया और मणिपुर की विख्यात रचनाकार अरमबम ओंगबी मेमचौबी को सम्मानित किया गया। ममता कालिया को हिंदी रचना जीवन की बेचैनी के लिए और अरमबम ओंगची मेमचौबी को मणिपुरी साहित्य धारा के विरुद्ध के लिए यह सम्मान मिला है। इसके अलावा कविता वर्ग में सविता सिंह के संग्रह ‘वासना एक नदी का नाम है’,नाइश हसन की कृति ‘मुताह’ और कथा वर्ग में शहादत के कथा संग्रह ‘कर्फ्यू की रात’ को श्रेष्ठ कृति सम्मान दिया गया। 

विख्यात कथाकार ममता कालिया
भाषा और साहित्य के रूप में अंग्रेजी ने मेरे लिए साहित्य के प्रति जुनून के जादुई द्वार खोल दिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में एमए की छात्रा थी, वहां पुस्तकालय और गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों की उपलब्धता ने जीवन और साहित्य के प्रति मेरी सोच को बदल दिया। मुझे ऊंची उड़ान भरने के लिए नए पंख मिले। मैं पहले से ही हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखती थी, लेकिन बाद में कथा में दिलचस्पी बढ़ गई। मैंने  38 वर्ष अध्यापन और प्रशासन में बिताए।

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अरमबम ओंगची मेमचौबी, प्रख्यात साहित्यकार
सर्वोच्च सम्मान- आकाशदीप (धारा के विरुद्ध)
आकाशदीप से सम्मानित विराट साहित्यकारों की परंपरा में स्वयं को खड़ा देखना मेरे लिए किसी स्वप्न से कम नहीं है। हिंदी के विशाल लोक में मणिपुरी की एक महिला आवाज को सम्मिलित करके अमर उजाला ने सम्मान को मेरे लिए एक ऐतिहासिक स्मृति में बदल दिया है। यह महिला आवाज का सम्मान है।

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छाप (कविता) - सविता सिंह - वासना एक नदी का नाम है
यह सृष्टि की वासना है...स्त्रीवादी नजरिये से वासना, प्रेम जैसे शब्दों का मैं अपने ढंग से अर्थ खोज रही हूं। पितृसत्ता में जहां स्त्रियों का दर्जा कभी भी समान नहीं होता, उसकी मनुष्यता को नष्ट करने के हर प्रयास होते हैं। इन सबसे बचकर स्त्री अपने जीवन को गहराई में ले जाती है। वहां उसे पता चलता है कि यह सृष्टि की वासना है। उसमें कहीं कोई खोट नहीं है।

छाप (कथेतर) - नाइश हसन - मुताह
स्त्री की मर्यादा का प्रश्न - उन लड़कियों की जिंदगी को देखकर हैरान हुई, जिन्होंने जीवन में कई बार मुताह की तकलीफ को बर्दाश्त किया। दो बालिग लोग अगर सहमति से साथ रह रहे हैं तो कोई सवाल नहीं, लेकिन अगर इसमें मर्जी नहीं है और बहुत कुछ छिपा है तो यह सवाल स्त्री गरिमा और मर्यादा के बिल्कुल खिलाफ है। मैंने इसी नजरिये से इस किताब को लिखा है।

छाप (कथा) - शहादत - कर्फ्यू की रात
समाज की रूढ़ियों पर बात - ये कहानियां मुस्लिम समाज की बुनियादी समस्याओं पर बात करती हैं। यह ऐसा है कि आप एक ऐसे नरम-नाजुक फल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जो अंदर से सड़ रहा है। हम उम्मीद करते हैं कि जब समाज की रक्षा के लिए हम सब दांव पर लगा रहे हैं तो उन परंपराओं और रूढ़ियों पर भी बात की जाए, जिसने उसमें ठहराव ला दिया।

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थाप (पहली किताब) - मनीष यादव - सुधारगृह की मालकिनें
खुद के प्रति मौन - मैंने उन स्त्रियों के लिए कविताएं लिखीं, जो अक्सर संघर्ष करती हैं, लेकिन खुद के प्रति मौन रहती हैं। परंपराओं का विरोध नहीं कर पाती हैं, उनके लिए एक आवाज बनने का प्रयास किया है। ‘सुधारगृह की मालकिनें’ में आपको बहुत सारी कविताएं दिखेंंगी, उन सभी मांओं के लिए, जो मां होने के अलावा बहुत कुछ होना चाहती रहीं।
 
श्रेष्ठ अनुवाद - भाषाबंधु - सुजाता शिवेन- चरु चीवर और चर्या (मूल ओड़िया)
जीवंतता की बड़ी चुनौती- अनुवाद एक ऐसा काम है, जो कृति के भीतर उतरकर उसे दूसरी भाषा में जीवंत कर देने की चुनौती देता है। प्रदीप दाश का यह ओड़िया उपन्यास एक बहुसम्मानित कृति है, जिसे हिंदी में प्रस्तुत करना एक चुनौती थी। मैंने इसे स्वीकार करके ओड़िया और हिंदी के बीच एक सशक्त सेतु बनाने की हरसंभव कोशिश की है।
 

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