अमर उजाला शब्द सम्मान 2018 में गिरीश कारनाड को सर्वोच्च सम्मान आकाशदीप से सम्मानित किया जा रहा है। साहित्यिक सम्मान मिलने पर गिरीश कारनाड कहते हैं कि अगर आप गड़बडिय़ों, अव्यवस्थाओं और कोलाहल के बीच भ्रम को नहीं समझ सकते, तो आप नाटकों में हो ही नहीं। आइए जानते हैं नाटककार, फिल्म निर्देशक और कलाकार गिरीश कारनाड ने और क्या कुछ कहा आकाशदीप सम्मान मिलने पर।
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काश! मैं एक जादूगर होता...
मैं भाग्यशाली रहा कि विविध भाषा संस्कृति में पला-बढ़ा। यही कारण है कि मैं अच्छी हिंदी बोल सकता हूं। मैं कवि बनना चाहता था। मेरी थियेटर में भी रुचि थी, लेकिन मेरा नाटक लेखक बनने का कोई इरादा नहीं था। रोड्ïस स्कॉलरशिप मिलने के बाद मैं लंदन पहुंचा। उस समय एक धारणा थी कि यदि मैं विदेश जाउंगा, तो मैं विदेश की किसी गोरी मेम से शादी कर लूंगा। तभी एक दिन मेरे मन में ययाति लिखने का विचार आया। इसके बाद जिंदगी में कई मोड़ आए।
नाटकों के लेखन-निर्देशन, अभिनय के अलावा फिल्म निर्देशन में भी आया। जादूगरी में भी मेरी दिलचस्पी थी। जादू के शो चाव से देखता था। लेकिन जादू नहीं कर पाया। फिर मैंने मुंबई छोड़ा और वापस आ गया, क्योंकि मेरी पत्नी कहती थी कि बहुत हो गया हिंदी सिनेमा। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे आज भी ऑफर आते हैं। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज नाटक था। आज भी है। फिल्मों से पैसा कमाया। कभी आत्मसंतुष्टि नहीं हुई। मेरे सभी नाटक कन्नड़ भाषा में हैं। हिंदी और कन्नड़ ने मुझे बनाए रखा है।
परिचय
गिरीश कारनाड का जन्म 19 मई 1938 को माथेरान महाराष्ट्र में हुआ था। गिरीश कारनाड की प्रमुख कृतियाों में ययाति, तुगलक, अग्नि मत्तु माले, ओदकलु बिम्ब, अंजुमल्लिगे, मा निषाद, टिप्पुविन कनसुगलु, हित्तिन हुंज, नागमंडल, हयवदन शामिल है। वहीं गिरीश कारनाड को साहित्य के क्षेत्र में कई पुरस्कार मिले, जिसमें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, कन्नड़ साहित्य अकादेमी पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, कालीदास सम्मान, टाटा लिटरेचर लाइव लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार शामिल है। इसके अलावा गिरीश कारनाड को सिनेमा के क्षेत्र में भी ढेर सारे पुरस्कार मिले।