मरीज बनकर जब दलाल से बात की गई तो पूरा खेल समझ में आ गया है। खास बात यह है कि धंधेबाजों ने इस खेल में कमीशन देने में पूरी ईमानदारी बरती। जिन अस्पताल, पैथालॉजी या मेडिकल स्टोर की दुकान पर मरीजों को ले जाते हैं, वहां से शाम को दलाल कमीशन वसूलते हैं। फिर लस्सी की दुकान में पीछे बैठकर हर डॉक्टर से जुड़े लोगों का हिसाब-किताब करके बड़ी ईमानदारी से कमीशन की रकम पहुंचा दी जाती है।
आश्चर्य तो इस बात का है कि इसे रोकने की जिम्मेदारी लिए बैठा स्वास्थ्य महकमा कार्रवाई तभी करता है, जब मामला तूल पकड़े या फिर कोई आकर उनके दफ्तर तक शिकायत करे। खुद से विभाग को इसकी फिक्र नहीं है, जिस वजह से न चाहते हुए भी मुफ्त की जांच, दवा और एक्स-रे के लिए लोगों को जेब ढीली करनी पड़ रही है।
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बीआरडी में सीज एंबुलेंस।
- फोटो : अमर उजाला।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भी यही नेटवर्क काम कर रहा है। यहां पर एंबुलेंस, अस्पताल कर्मचारियों की सांठगांठ से मरीजों को ठगा जाता है। यहां पर मरीजों से दवा, जांच के नाम पर खेल तो होता ही है, सीधे मरीज प्राइवेट अस्पतालों को बेच दिए जाते हैं। मामला तब ही खुलकर सामने आता है, जब कोई फरियादी पुलिस तक पहुंच जाता है और फिर जांच के नाम पर पुलिस इसमें घुसती है।
मरीज एंबुलेंस माफिया, खून माफिया सबका सच उजागर हो चुका है, लेकिन मेडिकल कॉलेज के जिम्मेदारों ने अब तक इसमें कोई कार्रवाई नहीं की है। पुलिस ने फौरी तौर पर जिसे पकड़ा, उसे जेल भेज दिया, लेकिन मरीजों को स्थाई राहत देने की जिम्मेदारी जिनके पास है, वह खामोशी साधे हुए हैं। यहां पर दलालों का लंबा नेटवर्क हैं। इसमें अस्पताल के कर्मचारी भी शामिल हैं। मरीज को बेहतर इलाज का झांसा देकर कर्मचारी ही प्राइवेट अस्पताल ले जाने की सेटिंग करते हैं। फिर एंबुलेंस की मदद से भेजा जाता है। इस समय पुलिस ने सख्ती की है तो थोड़ा छिप-छिपाकर काम कर रहे हैं।
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स्थान जिला अस्पताल के एक्स-रे सेंटर, समय 12.30 बजे
सुबह 11 बजे सिकरीगंज की शिवकुमारी अपने बेटे के पैर का एक्स-रे कराने के लिए पहुंचीं। जब आईं तो पता चला कि क्षेत्रीय निदान केंद्र में पंजीकरण कराना होगा, इसके बाद एक्स-रे होगा। चोटिल बेटे को लेकर वह वहां गईं तो एक्स-रे सेंटर के बाहर आकर बारी आने का इंतजार कर रही थीं। तभी लंबी कद-काठी के पाल जी नाम से मशहूर बिचौलिया पहुंचा। हालचाल लेने का अंदाजा ऐसा था, जैसे कितना पुराना परिचित हो।
फिर हुई बातचीत का अंश....
दलाल: क्या माता जी, क्या हाल है, का हो गया है बाबू को
महिला: बेटा ! छत की सीढ़ी से गिर गया है, पैर लगता है कि टूट गया है
दलाल: त जल्दी आवे के चाहीं, नंबर लग गईल बा एक्स-रे खातिर ?
महिला: हां, 11 बजे डॉक्टर साहब देख लिए हैं, फिर पंजीकरण कराकर आए हैं
दलाल: तब आज जांच होने में ही 1 से 1.30 बज जाएगा
महिला: हो जाएगा ना, बाबू का इलाज
दलाल : हो तो जाएगा, लेकिन डॉक्टर साहब 2 बजे तक उठ जाएंगे
महिला : मतलब, आज रिपोर्ट नहीं देखेंगे
दलाल: नहीं आज कहां रिपोर्ट मिल पाएगा
महिला : तब तो फिर आना पड़ेगा, क्या करूं बाबू
दलाल : चला बाहर करवा दी, 350 रुपया में तुरंत मिल जाइ
महिला : वहां तुरंत हो जाएगा न
दलाल : हां, रिपोर्ट भी दिलवा दूंगा, डॉक्टर साहब को दिखवा भी दूंगा
(महिला तैयार हो गई और फिर साथ में लेकर दलाल चला गया)
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जिला अस्पताल के ओटी में सोमवार को सेटिंग के खेल में ही विवाद हुआ। दरअसल, हड्डी के ऑपरेशन में लगने वाले उपकरणों को लगाने से पहले स्टेलाइज करना होता है। जिला अस्पताल में इसकी सप्लाई होती नहीं है, इस वजह से मरीजों को बाहर से खरीदना होता है। मरीज को दुकान का नाम, दलाल ही बताते हैं, फिर वही ओटी तक उसे पहुंचाते भी हैं।
ओटी में उपकरण को लेकर आए एक दलाल की बात सोमवार को एक डॉक्टर को बुरी लग गई थी। दबी जुबान अस्पताल कर्मचारियों का कहना है कि एक दिन पहले धमकी देने वाला दलाल दूसरे डॉक्टर का करीबी है। इसी वजह से उस दिन आए डॉक्टर को गुस्सा आ गया, लेकिन अस्पताल प्रशासन का कहना है कि इस पर सख्ती से कार्रवाई की गई है। दलालों को चिह्नित कर कार्रवाई की जाएगी।
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दवाओं में इस तरह हो रहा खेल
जिला अस्पताल के बाहर दवा की दुकान पर लाइन से सादी पर्ची पर दवा का नाम लिखे लिए लोग खड़े हैं। पूछने पर बताते हैं, डॉक्टर साहब ने कुछ दवाएं ही अंदर से दीं.. वे बोले, अगर जल्दी ठीक होना हो तो बताओ बाहर से लिख दें। यह सुनने के बाद कोई भी मरीज या उसका तीमारदार हो, वह यही सोचता है कि चलो डॉक्टर की फीस तो नहीं देनी पड़ रही है, बाहर से ही दवा ले लेते हैं। फिर बाहर से दवा की पर्ची को सावधानी से लिखा जाता है।
दवा के दुकानदार एक बार जरूर पूछते हैं कि कितने नंबर कमरे में दिखाया है। कमरा नंबर मरीज को पर्ची काउंटर से बताया जाता है। कमरा नंबर को दवाओं की रकम के साथ दुकान पर रखे रजिस्टर पर दर्ज किया जाता है, ताकि शाम का हिसाब उसी हिसाब से हो सके। कई ऐसे भी दुकानदार हैं, जहां पर दलाल पहले से मौजूद होते हैं। ऐसा तब होता है, जब दवाओं की कीमत ज्यादा होती है और गड़बड़ी की आशंका होती है कि कहीं मरीज बाहर भालोटिया की ओर न चला जाए।
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जिला चिकित्सालय ओपीडी में लगी भीड़।
- फोटो : अमर उजाला।
चार सितंबर 2023: देवरिया निवासी मेडिकल कॉलेज में भर्ती एक मरीज को प्राइवेट नर्सिंग होम में शिफ्ट करने की तैयारी कर ली गई थी। इसके लिए रात में प्राइवेट एंबुलेंस को बुलाया गया था। मरीज को अंदर से बाहर जाने के लिए जरूरी औपचारिकताएं पूरी हो रही थीं, लेकिन इसके पहले ही पुलिस को इसकी भनक लग गई थी।
पुलिस ने एंबुलेंस को सीज कर दिया, लेकिन आरोपी फरार हो गए थे। इसके पहले भी मरीजों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने के दौरान ही पुलिस और एंबुलेंस मरीज माफिया से विवाद हो गया था। जिसके बाद पुलिस से हाथापाई की गई थी और पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा था।
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जिला अस्पताल में चल रहे खेल की जानकारी पुलिस को भी है और कमिश्नर को भी। 19 जुलाई को कमिश्नर ने सभी विभागों के साथ बैठक की थी, जिसमें जिला अस्पताल में पुलिस चौकी खोलने का फैसला लिया गया था। पुलिस की ओर से इसके लिए पहल भी गई थी। पुलिस अस्पताल प्रशासन से जगह मांग रही है। लेकिन, दो महीने का समय बीत गया, न तो जगह मिल पाई और न ही चौकी खुली। जाहिर है मेडिकल कॉलेज की तरह यहां पर भी चौकी खुले तो कुछ मामलों में ही सही, पुलिस सक्रिय होती, मामले भी सामने आते।