चूंकि जीएसटी में चेक पोस्ट खत्म कर दिए गए हैं, इसलिए ई-वे बिल की चेकिंग रास्ते में कही भी हो सकती है। अगर ट्रांसपोर्टर के पास ई-वे बिल नहीं पाया जाता है, तो 10 हजार रुपये या माल पर चोरी किए गए टैक्स के बराबर (इनमें जो भी ज्यादा हो) पेनाल्टी वसूल की जाएगी।
तीनों में कोई बनवा सकता है
माल भेजने वाले या उसे प्राप्त करने वाले में से कोई भी इसे बनवा सकता है लेकिन उसका जीएसटी में पंजीकृत होना जरूरी है। माल चाहे अपने वाहन से भेजा जा रहा हो या किराये के वाहन से, चाहे उसे सड़क मार्ग से भेजा जा रहा हो या हवाई मार्ग से, ई-वे बिल जरूरी है। माल भेजने से पहले अगर इन दोनों में से किसी ने इसे नहीं बनवाया, तो यह जिम्मेदारी ट्रांसपोर्टर की होगी।
अगर माल भेजने वाला या ट्रांसपोर्टर इस बिल को तैयार करवाता है तो माल प्राप्तकर्ता को जीएसटी पोर्टल पर उसे स्वीकार करने या खारिज करने के लिए 72 घंटे के मोहलत दी जाएगी। अगर इस बीच उसने कोई कार्रवाई नहीं की तो उसे माल रिसीव करना होगा।
ई-वे बिल के नियम बदले
- इसे आसान बनाने के लिए सरकार ने हाल में इसके नियमों में बदलाव किए हैं। अब व्यापारी चाहें तो जीएसटी से मुक्त वस्तुओं को ई-वे बिल से बाहर रख सकते हैं।
- 50 किमी तक माल परिवहन के मामले में ई-वे बिल में वाहन का ब्योरा दर्ज करना जरूरी नहीं होगा। पहले यह सीमा 10 किमी रखी गई थी।
- एक राज्य से दूसरे में जा रहे किसी वाहन में अगर हर कंसाइनमेंट का मूल्य 50 हजार से कम है लेकिन उसमें कुल 50 हजार से ज्यादा के कंसाइनमेंट लादे गए हैं तो ई-वे बिल की जरूरत नहीं होगी।
क्या है ई-वे बिल
जीएसटी प्रणाली में राज्य के अंदर या दूसरे राज्य में 50 हजार रुपये से ज्यादा के माल के परिवहन के लिए ई-वे बिल या इलेक्ट्रॉनिक वे बिल अनिवार्य है। इसे जीएसटी पोर्टल (जीएसटीएन) पर ऑनलाइन जेनरेट किया जाता है। माल भेजने से पहले इसे तैयार करना जरूरी और इसमें माल का ब्योरा, उसे भेजने और प्राप्त करने वालों के नाम और ट्रांसपोर्टर का जिक्र होना चाहिए। इसके अलावा इसमें माल को भेजने का समय और उसे पहुंचने में लगने वाले अनुमानित समय को भी दर्ज करना होगा।
ट्रांसपोर्टर को माल के इनवॉयस के साथ ई-वे बिल की कॉपी भी रखनी होगी। वह चाहे तो ई-वे बिल का नंबर भी पास में रख सकता है बशर्ते वह रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन डिवाइस (आरएफआईडी) से जुड़ा हो।