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सलमान मसाल्हा: अंधेरे कमरे में...

Salman Masalha
                
                                                         
                            
सलमान मसाल्हा हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में लिखने वाले कवि हैं। सन् 2006 में उन्होंने जेरूसलम में एक ऐसा बहुलतावादी मादरे-वतन बनाने की घोषणा की जिसमें यहूदी, अरब और दूसरे सभी नागरिक होंगे और उसका नाम रखा 'स्टेट ऑफ़ होमलैंड'। पढ़िए उनकी लिखी कविता अँधेरे कमरे में जिसे अनूप सेठी ने अनुवादित किया है।

अँधेरे कमरे में दिखती हैं जो चीज़ें 
वे नहीं दिखतीं रोशन कमरे में 
अजनबी रोशनी जो आती है दूर से 
आँगन में जा फिसलती है छाया की तरह
अँधेरे से थकी हारी।
एक काला पंछी खिड़की की मुंडेर पर
चूस रहा है शहद कोहरे में 
मैं रहस्यों की किताब से एक आशीर्वाद थामता हूँ
मैं आँसुओं की घाटी की कहानी खोलता हूँ
जो आदमी उथले पानी में तैरा
गड्ढों से सोनमछली पकड़ता है और
उन्हें चोरों से बचाता है बच्चे के लिए
जो भीग कर आँसू की बूँद में डूब गया
अँधेरे कमरे में तुम याद करते हो
बातें जो भूल चुके थे
पराए वतनों में। अँधेरे में
जो चाहतों के साथ साथ बढ़ता है
बच्चे के लिए जो नहीं है, पीछे एक कमरा 
है बड़े हो चुके बच्चे की यादों से भरा।
तालाबन्द ऐसे अतीत की तरह जिसने 
वर्तमान कभी जाना ही नहीं
ठसाठस, एक ज़िन्दग़ी की तरह 
मौत की अति भी है जिसके साथ। 

साभार- नया ज्ञानोदय
8 वर्ष पहले

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