मेरी ज़िंदगी बहन
मेरी ज़िंदगी बहन ने आज की बाढ़
और बहार की इस बारिश में
ठोकरें खाई हैं हर चीज से
लेकिन सजे-धजे दंभी लोग
बड़बड़ा रहे हैं जोर-जोर से
और डस रहे हैं एक विनम्रता के साथ
जई के खेतों में साँप।
बड़ों के पास अपने होते हैं तर्क
हमारी तर्क होते हैं उनके लिए हास्यास्पद
बारिश में बैंगनी आभा लिए होती हैं आँखें
क्षितिज से आती है महक भीगी सुरभिरूपा की।
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