मुझे तुम पर भरोसा नहीं
वह ऐसे पेश आ रही है मानो हम कभी मिले ही नहीं
मैं समझ नहीं सकता
वह छोड़ देती है मेरा हाथ
छोड़ दिया है उसने मुझे दीवार की तरफ मुँह करके
मुझे यकीन है कि मुझे पता है
कि वह क्यों चली गई
लेकिन मैं उसके करीब बिल्कुल नहीं पहुँच सकता
हालाँकि हमने चुंबन किया जंगल की चमकती रात में
उसने कहा वह कभी नहीं भूलेगी
लेकिन अब सुबह स्पष्ट है
मानो कि मैं यहाँ हूँ ही नहीं
वह ऐसे पेश आ रही है मानो हम कभी मिले ही नहीं
यह सब मेरे लिए है नया
किसी रहस्य की तरह
एक गप्प की तरह भी हो सकता यह
फिर भी यह सोचना मुश्किल है
कि वह वही है
जिसके साथ था मैं कल रात
अंधकार के कारण हो गए हैं सपने वीरान
क्या मैं अभी भी स्वप्न देख रहा हूँ
मैं चाहता हूँ कि वह प्रकट हो
एक बार वह अपनी आवाज में बात करे
ऐसे पेश आने के बजाय मानो हम कभी मिले ही नहीं
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