जब थोड़े में मन खुश था
तब जीने का मजा हीं कुछ और था
नहीं थे जब ऐसी कूलर
तब छत पर सोने का मजा कुछ और था
गर्मी की भरी दोपहर में झरती मटकी का
पानी पीने का वो दौर कुछ और था
रात में छत पर रखी सुराही का ठंडा पानी
पीने का मजा हीं कुछ और था
शाम होते हीं छत पर पानी से छत की तपन कम करते
उठी सौंधी खुशबु कैसे भूल सकता है कोई
फिर प्यार से लगाए किसी दूसरे के बिस्तर पर जाकर
जोर से पसरने का मजा ही कुछ और था
बंद हवा में वो पंखी का झलना
आज भी याद है मगर
ठंडी हवा के पहले झोंके से छायी
शीतलता का मजा हीं कुछ और था
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जोर से पसरने का मजा ही कुछ और था
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