तन मन पर होने लगी, रंगों की बौछार
ठुमरी फिर गाने लगा, होली का त्यौहार
पिचकारी में सज गए, लो टेसू के रंग
बच्चों भी करने लगे होली का हुड़दंग
घर में फिर छनने लगी, ठंडाई और भंग
फागुन ने बिखरा दिए, कितने सारे रंग
हंसी ठिठोली हो रही, पड़ी ढोल पर थाप
अपने सुर में ले रहे, देखो सब आलाप
कवित्त –
कान्हामय राधा
(कवित्त में 31 वर्ण पहली पंक्ति में 16, दूसरी पंक्ति में 15)
हो री होरी आई हिया हुलस-हुलस जाए,
राधे रानी रावरे के रंग, रंग राती हैं
सर-सर सर से चुनरिया सरक जाए
गोरे-गोरे गालों पे गुलाल सकुचाती हैं
साँवरे सलोने सुर बाँसुरी का तेरा सुन
तन-मन भूल सुध-बुध बिसराती हैं
कोई, कहु कहे कान्हा आए, कान्हा आए सखि,
लाज से सिमट झट घुँघटा गिराती हैं
भर पिचकारी कान्हा ने जो मारी, भीगी सारी,
सारी भीगी राधा, कान्हामय हुई जाती हैं
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