हम सबके भीतर रहता है
हर कोने में बुद्ध अधूरा !
त्यक्त किन्तु सहचरी बनी हैं
जाने कितनी यशोधराएं
सुख दुख पैदा करती रहतीं
उगती ढलती सौ तृष्णाएं
उड़का हुआ द्वार है मन का
मुक्त और अवरुद्घ अधूरा !
कितनी बार सहज होने को
घेरे रहती है असहजता
होठों पर तिरती मुस्कानें
ऑखों से पानी है बहता
मध्यम मार्ग खोजता है मन
मुग्ध अधूरा क्रुद्ध अधूरा !
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X