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Social Media Poetry: हम सबके भीतर रहता है हर कोने में बुद्ध अधूरा !

वायरल काव्य
                
                                                         
                            हम सबके भीतर रहता है 
                                                                 
                            
हर कोने  में बुद्ध अधूरा !

त्यक्त  किन्तु सहचरी बनी हैं 
जाने कितनी यशोधराएं
सुख दुख पैदा करती रहतीं 
उगती ढलती सौ तृष्णाएं

उड़का हुआ द्वार है मन का
मुक्त और अवरुद्घ अधूरा !

कितनी बार सहज होने को 
घेरे रहती है असहजता
होठों  पर  तिरती  मुस्कानें 
ऑखों से पानी है बहता 

मध्यम मार्ग खोजता है मन
मुग्ध  अधूरा  क्रुद्ध  अधूरा !

एक अधूरापन ढोती है 
थकी हुयी जीवन की यात्रा
एक   खोज   है   इस  जीवन  में 
किस किस की हो कितनी मात्रा ?

कुछ  भी  पूरा नहीं हो सका 
शान्ति अधूरी युद्ध अधूरा ! 

साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से 
एक वर्ष पहले

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