वो प्रतिपल रूप बदलता है,
थिरकते बादल में वो कौन?
है कितना चारु,चपल,गतिमान,
छुपा सा नृत्य प्रदर्शित मौन।।
वो गर्जन सम की थाप लिए,
राग मल्हार हुआ साकार ।
निहारूं,चकित,भ्रमित,विस्मित,
धरा का नव आकार प्रकार ।।
ये बूंदें निराकार, निर्वर्ण,
किंतु हैं सप्तरंग छविमान।
हैं बिखरे स्वप्निल रंग सभी,
हुए मन,नयन पूर्ण अभिराम।।
घुमड़ते बादल की यह रीत,
कि ज्यों प्रिय-विरह-विधुर की प्रीत।
बरस कर तड़प-तड़प कर ज्यों,
तड़ित् से प्रणयन करते गीत।।
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