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Hindi Ghazal: जीने का रस कहाँ नहीं है जीनेवालों से पूछो

उर्दू अदब
                
                                                         
                            परबत के पैताने पहुँचे परबत के सिरहाने भी
                                                                 
                            
कहाँ-कहाँ तक ले जाते हैं अक्सर कई बहाने भी

हरा-भरा सागर लहराता चंद डोंगियों-जैसे घर
महानगर के उस जंगल से बेहतर ये वीराने भी

जीने का रस कहाँ नहीं है जीनेवालों से पूछो
इसीलिए लगती हैं शायद चट्टानें आँखुवाने भी

गुमसुम-गुमसुम है वनराजी लहराती-गाती भी है
गम-सरगम को पहचानो तो होंगे कई घराने भी

दूर देश जा रहे पहड़ों से पूचा तो यूँ बोले
क़दमों में राहें होंगी तो होंगे ठौर-ठिकाने भी

कौन कहाँ कब गिर जाएगा इसका कोई पता नहीं
कई बार तो गिर जाती हैं बड़ी-बड़ी चट्टानें भी

खो जाते हैं घर में रहकर बाहर ख़ुद को पा जाते
पहचाने जाने लगते हैं अपने भी बेगाने भी

शिमला-उमला मालरोड के माल-टाल की क्या पूछो
उकसाती है जेब, जेब ही लगती है खिजलाने भी

~ रामकुमार कृषक

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एक महीने पहले

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