हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम को भी पाला था माँ-बाप ने दुख सह सह कर
वक़्त-ए-रुख़्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आँसू कभी टपके जो रुख़ से बह कर
तिफ़्ल उन को ही समझ लेना जी बहलाने को
देश सेवा ही का बहता है लहू नस नस में
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की क़स्में
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में
भाई ख़ंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनें तय्यार चिताओं पे हैं जल जाने को
नौजवानों जो तबीअत में तुम्हारी खटके
याद कर लेना कभी हम को भी भूले-भटके
आप के उ'ज़्व-ए-बदन होवें जुदा कट कट के
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके
पर न माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
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