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नुशूर वाहिदी: वक़्त का क़ाफ़िला आता है गुज़र जाता है

उर्दू अदब
                
                                                         
                            वक़्त का क़ाफ़िला आता है गुज़र जाता है
                                                                 
                            
आदमी अपनी ही मंज़िल में ठहर जाता है

एक बिगड़ी हुई क़िस्मत पे न हँसना ऐ दोस्त
जाने किस वक़्त ये इंसान सँवर जाता है

इस तरफ़ ऐश की शमएँ तो उधर दिल के चराग़
देखना ये है कि परवाना किधर जाता है

जाम-ओ-सहबा की मुझे फ़िक्र नहीं ऐ ग़म-ए-दिल
मेरा पैमाना तो अश्कों ही से भर जाता है

एक रिश्ता भी मोहब्बत का अगर टूट गया
देखते देखते शीराज़ा बिखर जाता है

हाल मेरे लिए है लम्हा-ए-आइंदा 'नुशूर'
वक़्त शाएर के लिए पहले गुज़र जाता है

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एक महीने पहले

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