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Social Media Poetry: सबको ख़ुद सा समझने की आदत

वायरल काव्य
                
                                                         
                            सबको ख़ुद सा समझने की आदत 
                                                                 
                            
हममें है एक ये बुरी आदत 

झट से कर लेते थे यक़ीं सब पर
ठोकरों ने सुधार दी आदत 

एक दम से तो ये न छूटेगी 
रफ़्ता रफ़्ता ही जाएगी आदत 

बात मनवा के अपनी दम लेना 
अब कहाँ हममें ये रही आदत 

बे सबब बात बात पर ग़ुस्सा 
दुश्मने-जां है ये तेरी आदत 

मैं किसी पर पलट के वार करूँ 
ये तो है ही नहीं मेरी आदत 

इक अजब सा सुकून है जब से 
ख़ुद में रहने की डाल ली आदत 

शाइरी शौक़ थी मेरा पहले 
जाने कब कैसे बन गई आदत 

लग गई एक बार तो ‘मधुमन’ 
छूटती कब है फिर कोई आदत 

साभार: मधु मधुमन की फेसबुक वाल से  

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एक महीने पहले

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