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Kaifi Azmi Poetry: बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

kaifi azmi famous ghazal jo wo mire na rahe main bhi kab kisi ka raha
                
                                                         
                            

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का
सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा 

2 वर्ष पहले

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